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Noida News: एक चूल्हे पर बनता है खाना, बहुओं ने बांट रखे हैं घर के काम
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-सामूहिक जीवन की मिसाल बना सलारपुर गांव का परिवार
-एक ही छत के नीचे रहती है 30 सदस्यों वाली फैमिली
दीपक शर्मा
दनकौर। तेजी से बदलते समाज में जहां संयुक्त परिवार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं, वहीं ग्रेटर नोएडा के सलारपुर गांव में रहने वाला राजमल सिंह का परिवार आज भी सामूहिक जीवन की मिसाल बना हुआ है। आधुनिक जीवनशैली के बावजूद करीब 30 सदस्यीय यह परिवार एक ही छत के नीचे, एक ही चूल्हे से बना खाना खाता है और पारंपरिक मूल्यों को जीवित रखे हुए है।
राजमल सिंह के पांच बेटे हैं, इनमें से एक पुलिसकर्मी, एक शिक्षक और तीन खेती से जुड़े हैं। उनके साथ बहुएं और बच्चे भी उसी घर में रहते हैं। घर में दस दूध देने वाले पशु हैं, जिनकी देखभाल का काम बहुएं आपस में बांटकर करती हैं। दो बहुएं रसोई का जिम्मा संभालती हैं, जबकि तीन बहुएं पशुओं की सेवा करती हैं। घर के बुजुर्ग राजमल सिंह खुद भी घरेलू कार्यों में बहुओं का सहयोग करते हैं। घर में दूध घी के लिए 10 पशु भी हैं। घर की आमदनी मुख्यत: खेती और मुआवजे से होती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी पिता राजमल सिंह के पास रहती है। परिवार का कोई भी सदस्य पैसे खर्च करने से पहले पिता की अनुमति लेता है। यह अनुशासन आज के समय में कम ही देखने को मिलता है।
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अलग हुई सबकी रसोई
फ्लैट कल्चर के बाद अब गांवों में भी संयुक्त परिवार बिखराव की ओर है। दनकौर निवासी पंकज शर्मा बताते हैं कि करीब 30 साल संयुक्त परिवार के साथ रहा हूं। एक घर में चूल्हे पर खाना बनता था। सभी लोग उसे पसंद करते थे। गर्मियों में शाम को एक साथ आंगन में चारपाई डालकर बैठकर बातें होती थी। घर की बेटियां खाना परोसतीं थीी, लेकिन अब सबकी अलग अलग रसोई हो गई।
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-सामूहिक जीवन की मिसाल बना सलारपुर गांव का परिवार
-एक ही छत के नीचे रहती है 30 सदस्यों वाली फैमिली
दीपक शर्मा
दनकौर। तेजी से बदलते समाज में जहां संयुक्त परिवार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं, वहीं ग्रेटर नोएडा के सलारपुर गांव में रहने वाला राजमल सिंह का परिवार आज भी सामूहिक जीवन की मिसाल बना हुआ है। आधुनिक जीवनशैली के बावजूद करीब 30 सदस्यीय यह परिवार एक ही छत के नीचे, एक ही चूल्हे से बना खाना खाता है और पारंपरिक मूल्यों को जीवित रखे हुए है।
राजमल सिंह के पांच बेटे हैं, इनमें से एक पुलिसकर्मी, एक शिक्षक और तीन खेती से जुड़े हैं। उनके साथ बहुएं और बच्चे भी उसी घर में रहते हैं। घर में दस दूध देने वाले पशु हैं, जिनकी देखभाल का काम बहुएं आपस में बांटकर करती हैं। दो बहुएं रसोई का जिम्मा संभालती हैं, जबकि तीन बहुएं पशुओं की सेवा करती हैं। घर के बुजुर्ग राजमल सिंह खुद भी घरेलू कार्यों में बहुओं का सहयोग करते हैं। घर में दूध घी के लिए 10 पशु भी हैं। घर की आमदनी मुख्यत: खेती और मुआवजे से होती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी पिता राजमल सिंह के पास रहती है। परिवार का कोई भी सदस्य पैसे खर्च करने से पहले पिता की अनुमति लेता है। यह अनुशासन आज के समय में कम ही देखने को मिलता है।
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अलग हुई सबकी रसोई
फ्लैट कल्चर के बाद अब गांवों में भी संयुक्त परिवार बिखराव की ओर है। दनकौर निवासी पंकज शर्मा बताते हैं कि करीब 30 साल संयुक्त परिवार के साथ रहा हूं। एक घर में चूल्हे पर खाना बनता था। सभी लोग उसे पसंद करते थे। गर्मियों में शाम को एक साथ आंगन में चारपाई डालकर बैठकर बातें होती थी। घर की बेटियां खाना परोसतीं थीी, लेकिन अब सबकी अलग अलग रसोई हो गई।
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