बिहार के रामून ने पूरा किया पापा का सपना: पिता काटते थे गोल्फ मैदान की घास, बेटा उसी ग्राउंड पर बना चैंपियन
गोल्फर रामून सिंह ने बताया कि उनके पिता दिल्ली स्थित दिल्ली गोल्फ क्लब में घास काटने और गोल्फ स्टिक की मरम्मत करने का काम करते थे। रोजाना गोल्फ के मैदान में खिलाड़ियों को खेलते देखना उनके पिता के मन में भी इस खेल के प्रति लगाव पैदा करता था। हालांकि आर्थिक परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं कि वह खुद गोल्फ खेल सकें या बेटे को महंगे संसाधन उपलब्ध करा सकें।
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सपने अक्सर सुविधाओं के मोहताज नहीं होते। यदि हौसला और मेहनत साथ हो तो अभावों के बीच पला-बढ़ा इंसान भी कामयाबी की ऐसी कहानी लिख सकता है, जो दूसरों के लिए मिसाल बन जाए। बिहार के बक्सर जिले के रहने वाले गोल्फर रामून सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
भारतीय नौसेन में कर रहे देश की सेवा
जिस खेल को उन्होंने कभी संसाधनों के अभाव में दूसरों से मांगकर खेलना शुरू किया था, उसी गोल्फ में आज उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। वह स्पोर्ट्स कोटे के तहत भारतीय नौसेना (नेवी) में देश की सेवा कर रहे हैं। ग्रेटर नोएडा के जेपी ग्रीन्स गोल्फ कोर्स में 02 से 05 सितंबर तक आयोजित हुई ट्रिनिटी गोल्फ चैंपियंस लीग (टीजीसीएल) के चौथे सीजन में नोएडा की वेव राइडर्स टीम का प्रतिनिधित्व किया है। लीग में बेहतर प्रदर्शन करते हुए गोल्फर ने सर्वश्रेष्ट खिलाड़ी का पुरस्कार भी अपने नाम किया। पूर्व भारतीय हॉकी टीम के कप्तान और ओलंपियन स्वर्ण पदक विजेता ने सैयद जफर इकबाल ने रामून को सम्मानित किया। इस लीग में उनकी टीम ने बाजी मारी।
पिता के सपने को किया पूरा
गोल्फर रामून सिंह ने बताया कि उनके पिता दिल्ली स्थित दिल्ली गोल्फ क्लब में घास काटने और गोल्फ स्टिक की मरम्मत करने का काम करते थे। रोजाना गोल्फ के मैदान में खिलाड़ियों को खेलते देखना उनके पिता के मन में भी इस खेल के प्रति लगाव पैदा करता था। हालांकि आर्थिक परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं कि वह खुद गोल्फ खेल सकें या बेटे को महंगे संसाधन उपलब्ध करा सकें। लेकिन बेटे ने उसी मैदान से निकलकर पिता के उस सपने को साकार कर दिया।
दूसरे की स्टीक मांग कर सीखी बारीकियां
जिसे शायद उन्होंने कभी खुद पूरा करने की स्थिति में नहीं पाया था। पिता ने गोल्फ खेलने के लिए बेटे का हर संभव प्रयास किया और उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। रामून का बचपन भी दूसरे बच्चों की तरह सुविधाओं से भरा नहीं था। मैदान में उपलब्ध सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने खेल की बारीकियां सीखीं। अन्य गोल्फरों से उन्हें गोल्फ स्टिक और गेंद मांगकर अभ्यास करना पड़ता था।
नेवी में चयन के बाद बदली जिंदगी
गोल्फर रामून सिंह ने बताया कि उन्होंने करीब 12 वर्ष की आयु में गोल्फ खेलना शुरू किया था। लेकिन एंट्री फीस नहीं होने से उन्हें कई गोल्फ टूर्नामेंट में खेलने का मौका नहीं मिला। 2002 में उन्होंने हाईस्कूल पास की। उसके बाद उनका चयन नेवी के लिए हुआ। नौसेना में सेवा के दौरान उन्होंने स्पोर्ट्स कोटे के तहत गोल्फ में ट्रायल दिया और बेहतर प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्हें नौसेना की ओर से खेल में आगे बढ़ने के लिए बेहतर सुविधाएं और अवसर मिलने लगे। उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में हिस्सा लिया और अपने प्रदर्शन से देश का नाम रोशन किया।
क्रिकेट खेलने पर पड़ी थी डांट
गोल्फर ने बताया कि बचपन में मैं क्रिकेट खेला करता था, लेकिन दूसरे बच्चों को गोल्फ खेलता देख पिता के मन में भी गोल्फ की रूचि बढ़ने लगी थी। रविवार की छुट्टी के दिन क्रिकेट खेलने पर पिता से डांट खाने पड़ती थी। वहीं, गोल्फ खेलने के लिए रुपये भी मिलते थे। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी गोल्फ उपकरण को थी। दूसरे गोल्फरों से स्टीक मांग कर गोल्फ खेलना होता था।