किसान संसद में महिला आरक्षण की गूंज

Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Tue, 27 Jul 2021 02:27 AM IST
Echo of women's reservation in farmers' parliament
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नई दिल्ली। दो दिन के अंतराल के बाद सोमवार को जंतर-मंतर पर फिर शुरू हुई किसान संसद की कमान महिलाओं ने संभाली। महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के साथ ही महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास किया गया। किसान प्रतिनिधियों ने कहा कि देश में 24 साल पहले महिलाओं को आरक्षण देने की बात कही गई थी, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ है। महिलाओं के उत्थान के लिए जरूरी है कि पहले उन्हें 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए और बाद में बढ़ाकर 50 फीसदी किया जाए।
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किसान संसद में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर व अभिनेत्री गुल पनाग सहित विभिन्न राज्यों की करीब 200 महिलाएं शामिल र्हुइं। सभी ने एक सुर में महिला हितों से जुडे़ मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कही। महिलाओं ने कहा कि देश की आधी आबादी का सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि उन्हें संसद में 33 फीसदी आरक्षण मिले और जल्द लागू भी किया जाए। संसद के तीनों सत्रोें में आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक पर भी चर्चा हुई। सभी प्रतिनिधियों ने इन कानूनों को महंगाई बढ़ाने वाला दस्तावेज बताया।

महिलाओं ने तीनों कृषि कानूनों का विरोध करते हुए इन्हें देश के किसानों के लिए घातक बताया। किसान नेता और पहले सत्र की उपाध्यक्ष जगमति सांगवान ने कहा कि नए कानूनों सेे खाद्य पदार्थों की महंगाई सांतवें आसमान पर पहुंच जाएगी। इस कानून के जरिए निजी क्षेत्र को असीमित भंडारण की छूट दी जा रही है। यह जमाखोरी और कालाबाजारी को कानूनी मान्यता देने जैसा है। वहीं, इस कानून में स्पष्ट लिखा है कि राज्य सरकारें असीमित भंडारण के प्रति तभी कार्रवाई कर सकती हैं, जब वस्तुओं की मूल्यवृद्धि बाजार में दोगुनी होगी। एक तरह से देखें तो यह कानून महंगाई बढ़ाने की भी खुली छूट दे रहा है। उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों की वजह से कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुकसान किसानों को उठाना पड़ेगा।
अलग-अलग राज्यों से पहुंची महिलाएं
किसान संसद में शामिल होने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों से महिलाएं पहुंची। पंजाब के बठिंडा से आई सुखविंदर कौर ने कहा कि हक की लड़ाई में महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर लड़ती रहेंगी। उन्होंने कहा कि वह पिछले सात महीन से आंदोलन में शामिल है। उन्होंने कई उतार चढ़ाव भी देखें, लेकिन आंदोलन में डटी रहीं। बलजीत कौर ने कहा कि केंद्र सरकार कॉरपोरेट घरानों के हाथ की कठपुतली बन गई है। उसी के इशारों पर यह कानून लाए गए हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के लागू होने से किसान भूखे मरने को मजबूर हो जाएंगे और सिर्फ बड़े पूंजीपतियों को लाभ मिलेगा।
मेधा पाटकर और गुल पनाग ने किया समर्थन
किसान संसद में शहीद भगतसिंह की भतीजी गुरजीत कौर के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, पूर्व सांसद सुभाषिनी अली सहगल, एनी राजा, अभिनेत्री गुल पनांग समेत कई हस्तियां शामिल हुईं। तीनों सत्रों की अध्यक्षता की जिम्मेवारी तीन महिला प्रतिनिधियों को सौंपी गई। पहले सत्र की कमान पूर्व सांसद सुभाषिनी अली सहगल ने संभाली। दूसरे सत्र में एनी राजा अध्यक्ष और तीसरे में मेधा पाटकर को अध्यक्ष बनाया। सभी सत्रों में प्रमुख तौर पर कृषि कानूनों पर चर्चा हुई और सभी महिलाओं ने इनका का विरोध किया।
आंदोलन के आठ महीने पूरे
संयुक्त किसान मोर्चे (एसकेएम) की तरफ से बयान जारी कर कहा गया कि 26 जुलाई को किसान आंदोलन के 8 महीने पूरे हो गए हैं। इन अवधि में लगभग सभी राज्यों के लाखों किसान सीमाओं पर चल रहे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। किसानों ने खराब मौसम के बावजूद सरकार की तरफ से आंदोलन को दबाने की कोशिशों का डटकर सामना किया। एसकेएम के नेताओं कहा कि विरोध प्रदर्शनों ने देश में किसानों की एकता और प्रतिष्ठा को बढ़ाया है और किसानों की पहचान को सम्मान दिलाया है।
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किसने क्या कहा
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महिलाएं घर का काम भी संभालती हैैं और खेती-बाड़ी भी, लेकिन आज तक उन्हें किसान का दर्जा नहीं दिया गया है। सरकार को आवश्यक वस्तु अधिनियम विधेयक को वापस लेना चाहिए। इसमें देरी से न केवल किसान बल्कि देश का पूरा वर्ग महंगाई के बोझ तले दब जाएगा।
- सुभाषिनी अली सहगल, पूर्व सांसद
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किसान दिल्ली की सीमाओं पर पिछले आठ महीने से आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकार सुनवाई नहीं कर रही है। किसान संसद के जरिए अपनी बात देश तक पहुंचाना चाह रहे हैं। तीनों कृषि कानून तत्काल रद्द किए जाने चाहिए।
- एनी राजा, भाकपा नेता
समाज में महिलाओं को अभी तक बराबरी का स्थान नहीं मिल सका है। किसान संसद के जरिए महिलाओं को उनकी बातों को देशभर तक पहुंचाने का मौका मिला है।
- मेधा पाटकर, सामाजिक कार्यकर्ता
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महिला किसान संसद से सबसे पहला संदेश तो महिला सशक्तिकरण का है कि महिलाओं को उनका अधिकार देना चाहिए. सरकार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की बात करती है, लेकिन उन्हें बराबरी का हक देने के मामले में गंभीर क्यों नहीं है।
- गुल पनाग, अभिनेत्री
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सरकार को लंबे समय से आंदोलन कर रहे किसानों की मांग मान लेनी चाहिए। नए कृषि कानून किसी भी तरह से उनको फायदा पहुंचाने वाले नहीं है। मैं और मेरा पूरा परिवार इन कानूनों के खिलाफ हैं।
गुरजीत कौर, शहीद भगत सिंह की भतीजी

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