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Noida News: झोलाछाप डॉक्टर के सहारे बीमारियों का हो रहा इलाज
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-गांव में संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दोपहर बाद हो जाता है बंद
-आसपास अस्पताल नहीं होने से 40 किमी दूर कराने जाते हैं उपचार
माई सिटी रिपोर्टर
यमुना सिटी। रबूपुरा क्षेत्र में एमबीबीएस चिकित्सक न होने के कारण दोपहर बाद स्थानीय लोगों को झोलाछाप का ही सहारा लेना पड़ता है। गांव में संचालित होने वाला प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी दोपहर के बाद बंद हो जाता है। ऐसे में मजबूरन आपातकाल स्थिति में ग्रामीण झोलाछाप से उपचार करा रहे हैं। इस चक्कर में कई ग्रामीणों की तबीयत भी बिगड़ चुकी है।
गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं काफी बदहाल हालत में है। सरकारी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध तो है लेकिन सीमित समय तक। कई बार आपातकाल स्थिति हाेने पर ग्रामीणों को शहर भागना पड़ता है या जल्दबाजी में झोलाछाप से ही उपचार लेते हैं। गांव निवासी सतेंद्र भाटी ने बताया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दोपहर दो बजे के बाद उपचार बंद हो जाता है। गांव के आसपास कोई बेहतर निजी अस्पताल भी नहीं है, जहां उपचार कराया जा सके। ऐसे में गांव के झोलाछाप से ही उपचार कराना पड़ जाता है।
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40 किमी दूर है शहर में अस्पताल
बेहतर उपचार लेने के लिए गांव से चालीस किमी दूर स्थिति शहर जाना पड़ता है। जहां आधुनिक तकनीकों से लैस अस्पताल भी हैं।अमित भाटी ने बताया कि कई बार दुर्घटना में घायल होने पर शहर तक जाने का समय नहीं होता। शहर तक पहुंचने में स्थिति न होने पर गांव के ही झोलाछाप से ही उपचार लेना पड़ता है, जो कि नुकसानदायक रहा है।
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-आसपास अस्पताल नहीं होने से 40 किमी दूर कराने जाते हैं उपचार
माई सिटी रिपोर्टर
यमुना सिटी। रबूपुरा क्षेत्र में एमबीबीएस चिकित्सक न होने के कारण दोपहर बाद स्थानीय लोगों को झोलाछाप का ही सहारा लेना पड़ता है। गांव में संचालित होने वाला प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी दोपहर के बाद बंद हो जाता है। ऐसे में मजबूरन आपातकाल स्थिति में ग्रामीण झोलाछाप से उपचार करा रहे हैं। इस चक्कर में कई ग्रामीणों की तबीयत भी बिगड़ चुकी है।
गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं काफी बदहाल हालत में है। सरकारी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध तो है लेकिन सीमित समय तक। कई बार आपातकाल स्थिति हाेने पर ग्रामीणों को शहर भागना पड़ता है या जल्दबाजी में झोलाछाप से ही उपचार लेते हैं। गांव निवासी सतेंद्र भाटी ने बताया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दोपहर दो बजे के बाद उपचार बंद हो जाता है। गांव के आसपास कोई बेहतर निजी अस्पताल भी नहीं है, जहां उपचार कराया जा सके। ऐसे में गांव के झोलाछाप से ही उपचार कराना पड़ जाता है।
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40 किमी दूर है शहर में अस्पताल
बेहतर उपचार लेने के लिए गांव से चालीस किमी दूर स्थिति शहर जाना पड़ता है। जहां आधुनिक तकनीकों से लैस अस्पताल भी हैं।अमित भाटी ने बताया कि कई बार दुर्घटना में घायल होने पर शहर तक जाने का समय नहीं होता। शहर तक पहुंचने में स्थिति न होने पर गांव के ही झोलाछाप से ही उपचार लेना पड़ता है, जो कि नुकसानदायक रहा है।
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