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जिला सैनिक बोर्ड के लिए तरस रहे हैं करीब 15 हजार सैनिक व भूतपूर्व सैनिक
Updated Wed, 12 Dec 2018 12:11 AM IST
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जिले के सैनिकों को अबतक नहीं मिला सैनिक बोर्ड
- छोटे-छोटे कामों के लिए लगाने पड़ रहे हैं गुरुग्राम के चक्कर
अमर उजाला ब्यूरो
नूंह। जिला बनने के 13 साल बाद भी नूंह जिले के सैनिक व पूर्व सैनिकों को जिला सैनिक बोर्ड नसीब नहीं हुआ है। ऐसे में सरहद की हिफाजत करने वाले जवानों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए अभी तक गुरुग्राम के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इससे भूतपूर्व सैनिकों में काफी रोष है। उनका आरोप है कि इस बारे में कई बार जिला प्रशासन को लिखित में अवगत करा चुके हैं, लेकिन आज तक इस पर कोई सुनवाई की गई है।
नूंह को 2005 में जिला बनाया गया था। यहां के करीब सात हजार लोग सेना में विभिन्न पदों पर नौकरी करते हैं तो करीब नौ हजार भूतपूर्व सैनिक हैं। इन लोगों को सैनिक बोर्ड से जुड़े छोटे-मोटे कार्यों के लिए आज भी गुरुग्राम के चक्कर लगाने पड़ते हैं। जबकि पलवल नूंह के बाद जिला बना था, लेकिन वहां जिला सैनिक बोर्ड बना दिया गया है।
रिटायर्ड कैप्टन बलबीर सिंह का कहना है कि इस मामले में सरकार व सेना के अधिकारी पता नहीं क्यों लेटलतीफी कर रहे हैं। अब हमें कैंटीन या फिर अपने वेलफेयर के कार्यों के लिए आज भी गुरुग्राम की दौड़ लगानी पड़ती है। जबकि प्रदेश के सभी जिलों में सैनिक बोर्ड बना दिए गए हैं।
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हवलदार कर्मबीर सिंह का कहना है कि जिला प्रशासन को इस मामले में रुचि लेनी चाहिए। सेना में जो जवान कार्यरत हैं, उनकी और उनके परिजनों की सहूलियत पर तो अधिक ध्यान होना चाहिए।
सूबेदार सुमेर सिंह का कहना है कि पलवल नूंह के बाद जिला बना था, लेकिन वहां के जिला प्रशासन ने इस मामले में रुचि दिखाई तो बोर्ड बन गया। अब वहां के सैनिकों को किसी प्रकार की दिक्कत नहीं है। लेकिन यहां करीब पंद्रह हजार सैनिक व भूतपूर्व सैनिक आज भी गुरुग्राम के चक्कर काट रहे हैं। यह सेना के जवानों की अनदेखी व अपमान है।
लेफ्टिनेंट विवेक छौंकर का कहना है कि इस बारे में कई बार लिखित रूप से मांग की जा चुकी है। एक बार इस बारे में चर्चा भी चली। लेकिन इसके बाद फिर बंद हो गई। सैनिक व भूतपूर्व सैनिक देश की शान होते हैं। उनकी दिक्कत प्राथमिकता के आधार पर जिला प्रशासन व सेना के अधिकारियों को दूर करनी चाहिए।
इस बारे में मुझे लिखित में कुछ नहीं मिला है। मुझ से पहले क्या कार्रवाई हुई, कहां रुकी हुई है, उसे दिखवा लिया जाएगा। निश्चित तौर पर जिला सैनिक बोर्ड अब तक यहां बन जाना चाहिए था। - पंकज कुमार, डीसी नूंह।
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- छोटे-छोटे कामों के लिए लगाने पड़ रहे हैं गुरुग्राम के चक्कर
अमर उजाला ब्यूरो
नूंह। जिला बनने के 13 साल बाद भी नूंह जिले के सैनिक व पूर्व सैनिकों को जिला सैनिक बोर्ड नसीब नहीं हुआ है। ऐसे में सरहद की हिफाजत करने वाले जवानों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए अभी तक गुरुग्राम के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इससे भूतपूर्व सैनिकों में काफी रोष है। उनका आरोप है कि इस बारे में कई बार जिला प्रशासन को लिखित में अवगत करा चुके हैं, लेकिन आज तक इस पर कोई सुनवाई की गई है।
नूंह को 2005 में जिला बनाया गया था। यहां के करीब सात हजार लोग सेना में विभिन्न पदों पर नौकरी करते हैं तो करीब नौ हजार भूतपूर्व सैनिक हैं। इन लोगों को सैनिक बोर्ड से जुड़े छोटे-मोटे कार्यों के लिए आज भी गुरुग्राम के चक्कर लगाने पड़ते हैं। जबकि पलवल नूंह के बाद जिला बना था, लेकिन वहां जिला सैनिक बोर्ड बना दिया गया है।
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रिटायर्ड कैप्टन बलबीर सिंह का कहना है कि इस मामले में सरकार व सेना के अधिकारी पता नहीं क्यों लेटलतीफी कर रहे हैं। अब हमें कैंटीन या फिर अपने वेलफेयर के कार्यों के लिए आज भी गुरुग्राम की दौड़ लगानी पड़ती है। जबकि प्रदेश के सभी जिलों में सैनिक बोर्ड बना दिए गए हैं।
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हवलदार कर्मबीर सिंह का कहना है कि जिला प्रशासन को इस मामले में रुचि लेनी चाहिए। सेना में जो जवान कार्यरत हैं, उनकी और उनके परिजनों की सहूलियत पर तो अधिक ध्यान होना चाहिए।
सूबेदार सुमेर सिंह का कहना है कि पलवल नूंह के बाद जिला बना था, लेकिन वहां के जिला प्रशासन ने इस मामले में रुचि दिखाई तो बोर्ड बन गया। अब वहां के सैनिकों को किसी प्रकार की दिक्कत नहीं है। लेकिन यहां करीब पंद्रह हजार सैनिक व भूतपूर्व सैनिक आज भी गुरुग्राम के चक्कर काट रहे हैं। यह सेना के जवानों की अनदेखी व अपमान है।
लेफ्टिनेंट विवेक छौंकर का कहना है कि इस बारे में कई बार लिखित रूप से मांग की जा चुकी है। एक बार इस बारे में चर्चा भी चली। लेकिन इसके बाद फिर बंद हो गई। सैनिक व भूतपूर्व सैनिक देश की शान होते हैं। उनकी दिक्कत प्राथमिकता के आधार पर जिला प्रशासन व सेना के अधिकारियों को दूर करनी चाहिए।
इस बारे में मुझे लिखित में कुछ नहीं मिला है। मुझ से पहले क्या कार्रवाई हुई, कहां रुकी हुई है, उसे दिखवा लिया जाएगा। निश्चित तौर पर जिला सैनिक बोर्ड अब तक यहां बन जाना चाहिए था। - पंकज कुमार, डीसी नूंह।