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सरकार से नाउम्मीदी के बाद मेवातियों को न्यायपालिका से आस
Updated Tue, 21 Aug 2018 07:36 PM IST
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सरकार से नाउम्मीदी के बाद मेवातियों को न्यायपालिका से आस
- लोग उठा रहे सरकारी सिस्टम पर सवाल
- एक दर्जन विधानसभा सीटों पर मेवाती मतदाता बनते है निर्णायक
अमर उजाला ब्यूरो
नगीना। साहिब, पहलु, उमर, तालिम और रकबर को इंसाफ दिलाने के लिए मेवातियों ने सरकारों के सामने जोर-शोर से अपना पक्ष रखा, परंतु कामयाब नहीं रहे। आखिरी हथियार न्याय पालिका है, जिससे उम्मीद बंधी है। अकेला साहिब ऐसा है जो किसी अपराध में शामिल नहीं होने के बावजूद नूंह जिले के गांव पटाकपुर में पुलिस की गोली से मारा गया। जबकि अन्य लोग अलवर के गांवों में भीड़ हिंसा के शिकार हुए थे। अब लोग मौजूदा सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं।
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर रफीक आजाद का कहना है कि यह दुर्भाग्य ही है जिस मेवात के लोगों ने देश की रक्षा के लिए अंग्रेजों की गोलियां खाई। फांसी पर झूल गए उसे आज लोग सिर्फ गोतस्करों के अड्डे के रूप में बदनाम कर रहे हैं। कुछ गोतस्करों की वजह से यहां के नायकों का बलिदान धूमिल हो रहा है।
वरिष्ठ समाजसेवी रमजान चौधरी का कहना है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व सीएम भूपेेंद्र हुड्डा व स्वतंत्रता सेनानी रणवीर हुड्डा ने मेवातियों के बलिदान को सराहा। लेकिन मौजूदा सरकार नहीं सुन रही है।
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राजनीतिक विश्लेषक चौधरी असगर गोरवाल व शिक्षाविद् फजरूददीन बेसर का कहना है कि राजस्थान के विधानसभा चुनाव में दो-चार महीने बाकी है और वहां की एक दर्जन से अधिक सीटों पर मेव समाज निर्णायक भूमिका निभाता है। अलवर, भरतपुर की सीटों पर गाय के नाम पर भीड़ द्वारा हत्या करने का दुख समाज को दर्द दे चुका है।
इतिहासकार डॉक्टर मुंशी खां का कहना है कि सरकार को ऐसे मामले रोकने में देर नहीं करनी चाहिए। रकबर के बाद साहिब हत्याकांड ने हरियाणा और राजस्थान सरकार की लचरता का सबूत दिया है। सही मायनों में जाति के नाम पर भेदभाव हुआ है।
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- लोग उठा रहे सरकारी सिस्टम पर सवाल
- एक दर्जन विधानसभा सीटों पर मेवाती मतदाता बनते है निर्णायक
अमर उजाला ब्यूरो
नगीना। साहिब, पहलु, उमर, तालिम और रकबर को इंसाफ दिलाने के लिए मेवातियों ने सरकारों के सामने जोर-शोर से अपना पक्ष रखा, परंतु कामयाब नहीं रहे। आखिरी हथियार न्याय पालिका है, जिससे उम्मीद बंधी है। अकेला साहिब ऐसा है जो किसी अपराध में शामिल नहीं होने के बावजूद नूंह जिले के गांव पटाकपुर में पुलिस की गोली से मारा गया। जबकि अन्य लोग अलवर के गांवों में भीड़ हिंसा के शिकार हुए थे। अब लोग मौजूदा सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं।
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर रफीक आजाद का कहना है कि यह दुर्भाग्य ही है जिस मेवात के लोगों ने देश की रक्षा के लिए अंग्रेजों की गोलियां खाई। फांसी पर झूल गए उसे आज लोग सिर्फ गोतस्करों के अड्डे के रूप में बदनाम कर रहे हैं। कुछ गोतस्करों की वजह से यहां के नायकों का बलिदान धूमिल हो रहा है।
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वरिष्ठ समाजसेवी रमजान चौधरी का कहना है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व सीएम भूपेेंद्र हुड्डा व स्वतंत्रता सेनानी रणवीर हुड्डा ने मेवातियों के बलिदान को सराहा। लेकिन मौजूदा सरकार नहीं सुन रही है।
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राजनीतिक विश्लेषक चौधरी असगर गोरवाल व शिक्षाविद् फजरूददीन बेसर का कहना है कि राजस्थान के विधानसभा चुनाव में दो-चार महीने बाकी है और वहां की एक दर्जन से अधिक सीटों पर मेव समाज निर्णायक भूमिका निभाता है। अलवर, भरतपुर की सीटों पर गाय के नाम पर भीड़ द्वारा हत्या करने का दुख समाज को दर्द दे चुका है।
इतिहासकार डॉक्टर मुंशी खां का कहना है कि सरकार को ऐसे मामले रोकने में देर नहीं करनी चाहिए। रकबर के बाद साहिब हत्याकांड ने हरियाणा और राजस्थान सरकार की लचरता का सबूत दिया है। सही मायनों में जाति के नाम पर भेदभाव हुआ है।