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शरीर के किसी भी हिस्से को चपेट में ले सकता है टीबी: डॉ वीरोत्तम तोमर
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शरीर के किसी भी हिस्से को चपेट में ले सकता है टीबी: डॉ वीरोत्तम तोमर
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। हैदराबाद में सिल्वर जुबली नेशनल कांफ्रेंस नेपकोन में डॉ वीरोत्तम तोमर ने टीबी रोग से होने वाले प्लूरिसी रोग के निदान पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया के समस्त टीबी रोगियों के 28 प्रतिशत रोगी भारत में पाए जाते हैं। टीबी जहां मुख्य रूप से फेफड़ों को संक्रमित करती है, वहीं यह बीमारी शरीर के किसी भी अन्य को अपनी चपेट में ले सकती है ,फेफड़ों के अलावा अन्य अंगों में पाए जाने वाली टीबी की प्रतिशत 15 से 20% होती है ,जिनमें मुख्य रूप से फेफड़ों की झिल्ली में पानी आना जिसे प्लूरिसी कहते हैं, फेफड़ों की गले या पेट इत्यादि में गांठे हो जाना, दिमाग की टीबी, हड्डियों की टी बी ,आंखों की टीबी या अन्य जगह की टीबी शामिल है। उन्होंने बताया कि इसमें देश भर के 4000 छाती रोग विशेषज्ञों ने और 25 अन्य देशों के 65 छाती रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया। डॉ तोमर ने बताया कि प्लूरिसी टीबी की ज्यादा गंभीर बीमारी नहीं है परंतु यदि इसको सही समय पर ना पकड़ा जाए व समय पर इस पानी को न निकाला जाए तो फेफड़ों में मवाद इकट्ठा हो जाता है तथा फेफड़ों की झिल्ली मोटी हो जाने से मरीज को कई बार बड़ी सर्जरी करानी पड़ती है।
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शरीर के किसी भी हिस्से को चपेट में ले सकता है टीबी: डॉ वीरोत्तम तोमर
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। हैदराबाद में सिल्वर जुबली नेशनल कांफ्रेंस नेपकोन में डॉ वीरोत्तम तोमर ने टीबी रोग से होने वाले प्लूरिसी रोग के निदान पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया के समस्त टीबी रोगियों के 28 प्रतिशत रोगी भारत में पाए जाते हैं। टीबी जहां मुख्य रूप से फेफड़ों को संक्रमित करती है, वहीं यह बीमारी शरीर के किसी भी अन्य को अपनी चपेट में ले सकती है ,फेफड़ों के अलावा अन्य अंगों में पाए जाने वाली टीबी की प्रतिशत 15 से 20% होती है ,जिनमें मुख्य रूप से फेफड़ों की झिल्ली में पानी आना जिसे प्लूरिसी कहते हैं, फेफड़ों की गले या पेट इत्यादि में गांठे हो जाना, दिमाग की टीबी, हड्डियों की टी बी ,आंखों की टीबी या अन्य जगह की टीबी शामिल है। उन्होंने बताया कि इसमें देश भर के 4000 छाती रोग विशेषज्ञों ने और 25 अन्य देशों के 65 छाती रोग विशेषज्ञों ने भाग लिया। डॉ तोमर ने बताया कि प्लूरिसी टीबी की ज्यादा गंभीर बीमारी नहीं है परंतु यदि इसको सही समय पर ना पकड़ा जाए व समय पर इस पानी को न निकाला जाए तो फेफड़ों में मवाद इकट्ठा हो जाता है तथा फेफड़ों की झिल्ली मोटी हो जाने से मरीज को कई बार बड़ी सर्जरी करानी पड़ती है।