यादव सिंह के काले कारनामों का मुलायम कनेक्शन!
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पिछले महीने जब समाजवादी पार्टी यादव सिंह केस की जांच सीबीआई से न किए जाने के पक्ष में दलील देने सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो कोर्ट सहित सभी को आश्चर्य हुआ कि आखिर यूपी सरकार इस मामले में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही है।
आज अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने एक खबर छाप कर इस कनेक्शन का खुलासा कर दिया। अखबार ने साफ कहा है कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के भाई और समाजवादी पार्टी से राज्यसभा के सांसद रामगोपाल वर्मा के बेटे अक्षय यादव को यादव सिंह ने एक बिजनेस डील में काफी सहायता पहुंचाई थी।
कंपनी रजिस्ट्रार के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद से सांसद चुने गए रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव ने एनएम बिल्डवेल नामक दिल्ली की कंपनी के 9,995 शेयर राजेश मनोचा से महज दस रुपये प्रति शेयर की कीमत पर प्राप्त किए थे।
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राजेश मनोचा यादव सिंह के सहायक होने के साथ ही उनकी पत्नी के बिजनेस पार्टनर भी थे। इस डील के एक महीने बाद ही 11 सितंबर 2013 को पहले से सस्पेंड चल रहे यादव सिंह को दोबारा उनके पद पर बहाल कर दिया गया था।
30 औद्योगिक प्लॉट कर दिए आवंटित
वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार एनएम बिल्डवेल उन कंपनियों में से एक है जो इनकम टैक्स विभाग द्वारा हवाला मामले में लिप्त पाई गई है जिसकी जांच चल रही है।
संयोगवश पिछले महीने जब आयकर विभाग ने यादव सिंह के नोएडा स्थित घर पर छापा मारा तो वहां मिली ऑडी कार में से 10 करोड़ रुपए नकद बरामद हुए। आयकर विभाग के सूत्र के मुताबिक ये ऑडी कार एनएम बिल्डर के पूर्व मालिक राजेश मनोचा से संबंधित है।
मनोचा मैक्कन इंफ्रा प्राईवेट लिमिटेड का भी डायरेक्टर है। यही कंपनी यादव सिंह केस में सीबीआई जांच का प्रमुख केंद्र है। गौरतलब है कि 2013 में इस्तीफा देने से पहले तक यादव सिंह की पत्नी कुसुमलता भी मैक्कन इंफ्रा की डायरेक्टर थीं।
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यादव सिंह ने फर्जी आवेदनों के बदले मैक्कन और उसकी सहायक कंपनियों को लगभग 30 औद्योगिक प्लॉट आवंटित कर दिए जिसकी जांच भी सीबीआई कर रही है।
1 लाख में दे दिए गए 3 करोड़ के शेयर
कंपनी रंजिस्ट्रार में अंकित रिकॉर्ड्स के अनुसार जब अक्षय यादव ने एनएम बिल्डवेल के शेयर लिए थे तब कंपनी के पास 1.58 करोड़ की लीजहोल्ड पर ली गई भूमि थी और उसपर बनी इमारत की कीमत लगभग 1.57 करोड़ थी।
यानि कुल मिलाकर उस वक्त कंपनी की कुल संपत्ति तीन करोड़ से भी ज्यादा थी। इसी कंपनी के 10 हजार शेयरों को अक्षय को मात्र एक लाख रुपए में ही दे दिया गया।
इन दस हजार शेयरों में से 9,995 शेयर अक्षय के नाम पर ट्रांसफर किए गए जबकि मात्र 5 शेयर उनकी पत्नी रिचा के नाम पर कर दिए गए। इन शेयरों को मात्र 10 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से अक्षय को दिया गया।
एनएम बिल्डवेल की 2014 की बैलेंसशीट की एक एंट्री के अनुसार अक्षय यादव के शेयर लेने के बाद कंपनी करीब 16,45,000 शेयर आवंटित करने वाली थी।
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इस शेयर बिक्री से महज एक लाख में खरीदी गई अक्षय की कंपनी को 164.5 करोड़ रुपये की कमाई होने वाली थी। क्योंकि जारी किए जाने वाले 16,45,000 शेयर को 1000 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर बेचा जाना था।
क्यों यूपी सरकार ने किया CBI जांच का विरोध
गौर करने वाली बात है कि जिस एनएम बिल्डवेल के शेयर को अक्षय और उनकी पत्नी ने मात्र दस रुपये में खरीदा था उसी कंपनी के शेयर की कीमत अब एक हजार रखी गई लेकिन, आवेदकों की आपत्ति के चलते यह प्रक्रिया बीच में ही रुक गई।
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हालांकि प्रक्रिया रुकने से पहले ही कंपनी को 1.64 करोड़ रुपए शेयर एप्लीकेशन के तौर पर मिल चुके थे। कंपनी के दस्तावेजों के अनुसार इसमें 17000 हजार शेयर अक्षय यादव को ही आवंटित किए गए थे।
5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में यादव सिंह मामले की सुनवाई के दौरान यूपी की सपा सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा इस मामले में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी लेने पर आपत्ति जाहिर की थी।
सपा सरकार ने कोर्ट में बताया कि खुद वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने यादव सिंह मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की बात यूपी सरकार से कही थी। जबकि यूपी सरकार ने कहा कि किसी मामले को सीबीआई जांच के लिए सौंपने का फैसला राज्य सरकार का होता है।