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‘फख्र है, कारगिल में शहीद हुआ था मेरा लाल’
शाहनवाज आलम/अमर उजाला, गुरुग्राम
Updated Wed, 26 Jul 2017 10:56 AM IST
सार
-कारगिल विजय दिवस: 26 जुलाई
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-आज भी याद कर परिजनों के आंखों में आ जाते हैं आंसू
-कारगिल की विजय के लिए हो गए थे वतन पर शहीद
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विस्तार
क्या आप नायक अहमद अली, नायक आजाद सिंह, सिपाही विजेंद्र सिंह को जानते हैं? शायद नहीं। ये तीनों भारत मां के वो सपूत हैं, जिन्होंने जंग-ए-कारगिल फतह करने के लिए अपनी जान दे दी। जब पूरे मुल्क में पाकिस्तान को हराकर कारगिल फतह की खुशी मनाई जा रही थी, तो इनके घरों में मातम का माहौल था।
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आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में तसल्ली थी। बेटा देश के लिए कुर्बान हो गया। भारत मां के सपूत ने मिट्टी का हक अदा कर दिया। आज भी अपने सपूतों को याद कर उनके घर वाले गमगीन हो जाते हैं, लेकिन फक्र से कहते हैं कारगिल में शहीद हुआ है मेरा लाल। आज भी वहां होता तो आतंकियों से लोहा लेता। देश पर मरने को हर किसी को नसीब नहीं होता है। तिरंगे का हर कोई कफन नहीं पहनता है।
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चोटी-5685 पर विजेंद्र ने दी शहादत
-गुरुग्राम मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर गांव दौलताबाद के किसान परिवार में जन्में विजेंद्र मार्च 1998 में कुमायूं रेजिमेंट में भर्ती हुए। 13 कुमायूं बटालियन में तैनात विजेंद्र ने पहले ऑपरेशन मेघदूत और फिर ऑपरेशन विजय में भाग लिया।
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चोटी नंबर 5685 को पाकिस्तानी फौज से मुक्त कराने के लिए हमला बोला। इसी दौरान अचानक दुश्मन की गोली विजेंद्र के सीने में लगी और वीर सपूत भारत की गोद में समा गया। विजेंद्र की शहादत के बाद केंद्र सरकार ने एक पेट्रोल पंप और मुआवजा राशि दी।
विजेंद्र के बड़े भाई राजेंद्र का कहना है कि चाचा हतिराम से प्रेरणा लेकर सेना में गया था। देश सेवा का बड़ा सपना था। राजेंद्र भी अपने बच्चों को सेना में भेजना चाहता है। पिता जगमाल सिंह कहते हैं जब युद्ध चल रहा था, उस समय बहन लक्ष्मी की शादी थी। उस समय नहीं आ सका। अचानक एक दिन उसके वीरगति की सूचना मिली। मानों परिवार पर पहाड़ टूट गया। मगर फक्र है बेटे ने देश के लिए अपनी शहादत दे दी।
20 दिन की उम्र में छिन गया बाप का साया
-तावड़ू में रहने वाले नायक अहमद अली 1985 में सेना में भर्ती हुए थे। देश सेवा के कई मेडल हासिल किए और फिर वह दिन भी आ गया, जिसका हर फौजी को इंतजार होता है। पाकिस्तान के हमले के साथ शुरू हुए कारगिल युद्ध में देश के लिए आगे लाइन में खड़ा होकर लड़ाई करते हुए 02 जुलाई 1999 को अपनी शहादत दे दी।
जब अहमद अली की शहादत की खबर आई तब उसकी दो बेटे और पांच बेटी में सबसे छोटी बेटी महज 20 दिन की थी। शहादत के बाद सरकार ने पेट्रोल पंप और मुआवजा राशि दी और बच्चों की पढ़ाई का वादा किया।
परिजनों का कहना है कि बच्चों का वादा अब भी वादा है। अहमद अली के भाई का कहना है दो भतीजे निजी कॉलेज से एमबीबीएस कर रहे हैं। इनकी पढ़ाई के लिए रक्षा मंत्रालय में कई बार अर्जी दी जा चुकी है, लेकिन फीस की राशि नहीं मिली।
खुद के जुगाड़ और बचत से इनको डॉक्टरी तालीम दिलवाई जा रही है। 20 दिन की उम्र में पिता का साया उठ जाने वाली सहाना अब 12वीं में पढ़ती है। उसका मकसद देश सेवा करना है। सहाना कहती है कि मैंने अपने पिता को नहीं देखा। बहन और भाई पिता के बारे मेें बताते हैं, लेकिन मुझे फक्र है कि मेरे पिता ने देश के लिए अपनी कुर्बानी दे दी।
21 घुसपैठियों को मारा था इस नायक ने
-पटौदी क्षेत्र के मुमताजपुर निवासी नायक आजाद सिंह कारगिल युद्ध में मोर्चा संभाले हुए थे। युद्ध के दौरान 4730 मुश्कोह घाटी पर तैनात थे। तभी पाकिस्तानी घुसपैठियों ने आक्रमण कर दिया। जवाबी कार्रवाई में उन्होंने 21 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया, लेकिन तभी एक के बाद एक गोली उनके सीने को चीरती चली गई।
09 जुलाई 1999 को वीरगति को प्राप्त हो गए। युद्ध के बाद मुआवजा और पेट्रोल पंप तो मिला, लेकिन उनके नाम पर हुई कुछ घोषणाएं अब भी बाकी हैं। शहीद कमांडो आजाद सिंह के बेटे राजू बीटेक की और बेटी निधि आर्मी अस्पताल दिल्ली से एमबीबीएस कर रही हैं। निधि का मकसद देश सेवा में जुटे सैनिकों व उनके परिवार की सेवा करना है।