नोएडा की और भी इमरतें गिराई जा सकती हैं!
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नोएडा-ग्रेटर नोएडा में सुपरटेक बिल्डर ही अकेला नहीं है, जिसने खरीदार को पजेशन समय पर नहीं दिया। दूसरे कई बिल्डरों के तीन लाख से अधिक फ्लैटों के पजेशन की तिथि पीछे छूट गई है। ये प्रोजेक्ट दो से तीन साल देरी से चल रहे हैं। इनके बायर्स अपने फ्लैट में जाने की बाट जोह रहे हैं।
नोएडा के सेक्टर 74, 75, 76, 77, 78,79,121,122,118,119 के अलावा एक्सप्रेसवे के दोनों तरफ दो दर्जन सेक्टरों में सौ से अधिक बिल्डर फ्लैट बना रहे हैं। इनमें करीब एक लाख फ्लैट बनने का अनुमान है।
ग्रेटर नोएडा वेस्ट में 150 से अधिक प्रोजेक्ट बन रहे हैं। यहां करीब दो लाख फ्लैटों का निर्माण हो रहा है। ग्रेटर नोएडा में भी 50 से अधिक बिल्डर प्रोजेक्ट पर निर्माण कार्य चल रहा है। इनमें 50 हजार से अधिक फ्लैट होने का अनुमान है।
ये भी बन सकता है सुपरटेक का मामला
दरअसल, सेक्टर-93 ए के एपेक्स और सियान टावर का विवाद हाईकोर्ट में जा चुका है। कोर्ट ने दोनों टावरों को गिराने का आदेश दिया है। प्राधिकरण भी दोनों टावरों को सील कर चुका है।
बिल्डर और खरीदार कह चुके हैं कि वह इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। कानून के जानकार मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में मामला जाते ही समय पर पजेशन न देने का मुद्दा भी उठेगा क्योंकि खरीदार इसी को आधार बनाने की बात कह चुके हैं।
यदि सुप्रीम कोर्ट में यह बात पहुंची तो पजेशन को लेकर सिर्फ सुपरटेक ही नहीं बल्कि अन्य बिल्डरों के लिए भी कोर्ट का आदेश नजीर बन सकता है।
खरीदार को समय पर नहीं दे पा रहे हैं पजेशन
नोएडा में बिल्डरों के लिए अंतिम योजना 2008-09 में लाई गई थी। इन सभी को उसी दौरान जमीन आवंटित कर दी गई। बिल्डरों ने दस फीसदी रकम का भुगतान कर किस्त पर जमीन ले ली। कुछ ने सबलीज करवा ली तो कुछ ने लीज करवाए बिना ही प्रोजेक्ट लॉन्च कर दिए।
लोगों ने फ्लैट बुक करवा लिए और उनसे इसकी कीमत भी वसूल ली गई। प्रोजेक्ट लॉन्च करते समय बिल्डरों ने 2010 से 2012 के बीच पजेशन देने का वादा किया था, लेकिन एकाध को छोड़कर कोई भी पजेशन नहीं दे पाए।
ग्रेटर नोएडा एक्सटेंशन की भी यही स्थिति है। वहां 2008-09 में अधिकतर प्रोजेक्ट लॉन्च किए गए। सभी ने 2011-12 में पजेशन देने का वादा कर लिया। इस बीच जमीन को लेकर किसान कोर्ट चले गए। वहां मामले को सुलझने में करीब दो साल लग गए। इससे पजेशन की तिथि पीछे छूट गई।
खरीदार पर सबसे ज्यादा मार
समय पर पजेशन नहीं मिलने का सबसे ज्यादा खामियाजा फ्लैट खरीदार को उठाना पड़ता है। अपनी सारी पूंजी दांव पर लगाकर वह फ्लैट बुक करवाता है। तीन साल में अपने फ्लैट में रहने के हिसाब से कैलकुलेशन कर बैंक की किस्त का भुगतान करता है।
किराए पर रहने वालों को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। लंबे समय तक किराए पर रहकर किस्त का भुगतान करना पड़ता है। उधर, हर बार सर्किल रेट बढ़ने से रजिस्ट्री के समय स्टांप शुल्क भी ज्यादा चुकाना पड़ता है।
नोएडा एक्सटेंशन फ्लैट ऑनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अभिषेक कुमार का कहना है कि फ्लैट खरीदने वालों को आर्थिक के साथ मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
क्यों होती है पजेशन में देरी?
बिल्डरों के अनुसार पजेशन में देरी की सबसे बड़ी वजह समय पर जमीन न मिल पाना है। प्राधिकरण बिल्डरों के नाम जमीन तो आवंटित कर देता है, मगर कब्जा नहीं दे पाता। बिना जमीन पर कब्जा मिले बाकी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। किसानों का आंदोलन इसकी दूसरी बड़ी वजह है।
बिल्डरों का कहना है कि जमीन पर पजेशन मिलने के बाद काम शुरू होता है, तभी किसान आंदोलन करने लगते हैं। उनको उस जमीन का पांच फीसदी आवासीय भूखंड और बढ़ा हुआ मुआवजा देने का मसला नहीं सुलझा होता है। इससे बिल्डर को मजबूरन काम बंद करना पड़ता है। तीसरी अड़चन सरकारी औपचारिकताओं की है।
प्राधिकरण से नक्शा पास कराने के अलावा इनवायर्नमेंट क्लीयरेंस, फायर विभाग की एनओसी, प्रदूषण कार्यालय से एनओसी आदि के चक्कर काटने पड़ते हैं। क्रेडाई के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मनोज गौड़ के मुताबिक अगर ये सभी एनओसी एक जगह से मिलने लगे तो बिल्डर निश्चित रूप से समय पर पजेशन देने की स्थिति में होंगे।
अपार्टमेंट एक्ट का अता-पता नहीं
यूपी अपार्टमेंट एक्ट को नोएडा प्राधिकरण के बोर्ड से मंजूरी तो मिल चुकी है, मगर उसकी नियमावली पिछले छह माह से बन रही है। अभी तक कुछ पता नहीं है कि यह कब तक बन पाएगी और कब प्रभावी होगी। इसमें तय समय पर पजेशन देने के प्रावधान हैं। प्राधिकरण के चेयरमैन
तय समय पर पजेशन न मिलने पर खरीदार कानूनी लड़ाई लड़ सकता है, मगर इसके लिए पक्का दस्तावेज उसके पास हो। एग्रीमेंट को रजिस्टर्ड कराने से यह दस्तावेज पक्का हो जाएगा।
नोएडा के एआईजी स्टांप एसके सिंह का कहना है कि एग्रीमेंट को रजिस्टर्ड कराने से समय पर पजेशन देने का बिल्डर पर दबाव बनेगा। एग्रीमेंट रजिस्टर्ड कराने पर कुल कीमत का दो फीसदी स्टांप शुल्क लगता है। यह रजिस्ट्री के समय समायोजित भी हो जाता है।