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CBI करेगी यादव सिंह की अकूत संपत्ति की जांच

Thu, 16 Jul 2015 12:44 PM IST
Updated Thu, 16 Jul 2015 12:44 PM IST
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Major decision by a high court, CBI would be examined Yadav Singh case

हजारो करोड़ की अवैध सम्पत्ति मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने आज एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने नोएडा विकास प्राधिकरण में चीफ इंजीनियर रहे यादव सिंह की अवैध संपत्ति की जांच सीबीआई से कराने के आदेश दिए हैं।

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कोर्ट के इस आदेश से अखिलेश सरकार की बड़ी किरकिरी हुई है, क्योंकि सरकार कालेधन के इस कुबेर के खिलाफ हाथ पर हाथ धरे बैठी थी। वहीं दूसरी ओर कोर्ट के आदेश के बाद यादव सिंह की जांच का रास्ता निकला है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने बुधवार को ही कह दिया था कि उन्हें जस्टिस ए एन वर्मा की एक सदस्यीय कमीशन की जांच पर कोई भरोसा नहीं है। साथ ही कोर्ट ने अखिलेश सरकार के रवैये पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि सीबीआई जांच का आदेश तो सरकार को ही दे देना चाहिए था।
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इस टिप्पणी के एक दिन के बाद ही कोर्ट ने ये महत्वपूर्ण फैसला देते हुए यादव सिंह की संपत्ति को सीबीआई की जांच के दायरे में ला दिया है। आपको बता दें कि यादव सिंह के खिलाफ 10 हजार करोड़ की अवैध संपत्ति रखने का आरोप है।

जांच से असंतुष्ठ था हाईकोर्ट

Major decision by a high court, CBI would be examined Yadav Singh case

इस मामले की सुनवाई खुद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूर के साथ न्यायाधीश एस एन शुक्ला कर रहे थे। आदेश देते हुए कोर्ट ने ये भी कहा कि न्यायिक कमीशन की अपनी सीमा होती है इस वजह से इस मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।


यादव सिंह की अवैध संपत्ति जांच के लिए कोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने जनहित याचिका दायर की थी। नूतन की पीआईएल के आधार पर ही हाईकोर्ट का ये फैसला आया है।

बता दें 28 नवंबर 2014 को आयकर विभाग ने यादव सिंह के दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद स्थित ठिकानों पर छापा मारा था और करोड़ो रुपयों की चल-अचल संपत्ति के साथ गहने बरामद किए थे। इसके बाद 8 दिसंबर को सरकार ने यादव सिंह को सस्पेंड कर दिया था।

इस जांच के है कई सियासी मायने

Major decision by a high court, CBI would be examined Yadav Singh case

आपको बता दें कि यादव सिंह प्रकरण की जांच के पीछे सियासी मायनों को भी देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार इस केस को भी ताज कॉरीडॉर मामले की जांच की तरह ही लेना चाहिए।

यादव सिंह प्रकरण में तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत कई अन्य राजनीतिक हस्तियों तक आंच पहुंच सकती है। ऐसे में इस जांच को उत्तर प्रदेश में 2017 के विधान सभा चुनाव के नजरिए से काफी महत्व वाला माना जा रहा है।

सूत्र बताते हैं कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र के करीब 50 नामी बिल्डर ऐसे हैं जिनमें किसी न किसी नाम से उनकी हिस्सेदारी है। इन प्रोजेक्टों से कई वर्षों तक रकम आती रहेगी। यादव सिंह और उनके सहयोगियों ने मिलकर 40 बोगस कंपनियां बनाई थीं।

14 साल की जगह आठ साल में मिली बड़ी पोस्ट

Major decision by a high court, CBI would be examined Yadav Singh case

यादव सिंह का राजनीतिक कनेक्शन ऐसा था कि नियमों को ताक पर रखकर कम समय में ही बड़े-बड़े काम हो जाते थे। सूत्र बताते हैं कि एमटेक और पीएचडी की डिग्री के पीछे भी यही कहानी है।

जिसने उसे यह डिग्री दिलाई, उसके बदले में यादव सिंह ने अपनी ताकत का इस्तेमाल करके उनके बेटे को नोएडा प्राधिकरण में सहायक अभियंता की नौकरी दिलवा दी।

इतना ही नहीं, जिस पद तक पहुंचने में यादव सिंह को 14 साल लगते, वह वहां तक सात से आठ साल में पहुंच गए।

नियमों को ताक पर रखकर मिलते रहे थे प्रमोशन

Major decision by a high court, CBI would be examined Yadav Singh case

नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे विकास प्राधिकरण के चीफ इंजीनियर यादव सिंह के पास इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री थी। उन्हें सिविल के प्रोजेक्टों का इंचार्ज बनाया गया था।


इसके बावजूद नियमों को ताक पर रखकर उन्हें प्रमोशन दर प्रमोशन मिलते रहे। 1995 में यादव को प्राधिकरण में असिस्टेंट प्रोजेक्ट इंजीनियर बना दिया गया।

तब उनके पास इंजीनियरिंग की डिग्री भी नहीं थी। डिग्री हासिल करने के लिए बाकायदा पांच साल का वक्त दिया गया। तत्कालीन ओएसडी अराधना शुक्ला ने डिग्री लेने के लिए यादव सिंह को पत्र लिखा था।

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