निर्णायक भूमिका निभाने वाले वोटर मौन, प्रत्याशी बेचैन
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गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर निर्णायक भूमिका निभाने वाले मुस्लिम और गुर्जर वोटरों की चुप्पी से प्रत्याशियों में बेचैनी है। दोनों जाति के वोटरों पर न तो प्रदेश और न ही केंद्र सरकार का प्रभाव है।
स्थानीय स्तर की राजनीति ही वोटरों को अपनी ओर मोड़ती रही है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां की प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में वोटरों का अलग-अलग रुझान होता है।
दरअसल, इस बार लोक सभा क्षेत्र में करीब 19 लाख वोटर हैं। इनमें से मुस्लिम और गुर्जर बिरादरी के वोट 6 लाख से अधिक हैं। हर बार हार-जीत में इनकी भूमिका अहम रहती है।
शहर में जाति का प्रभाव नहीं
नोएडा विधानसभा का इतिहास देखें तो शहरी वोटर किसी जातिवाद के फेर में नहीं आते हैं। किसी एक जाति का बाहुल्य भी नहीं हैं। जो प्रत्याशी जितनी ज्यादा मेहनत कर लेता है उसको अधिक वोट मिल जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के डॉ. महेश शर्मा 27 हजार से अधिक वोटों से जीते थे।
यही कारण है कि इस बार नोएडा को चुनावी रैलियों से दूर ही रखा जा रहा है। प्रत्याशी और उनके परिवार के सदस्य ही प्रचार का जिम्मा संभाले हुए हैं।
प्रदेश में सबसे ज्यादा गुर्जर दादरी विधानसभा क्षेत्र में ही रहते हैं। ग्रेनो शहर की आबादी अभी करीब चार लाख के आसपास है, इसमें भी गांवों के आसपास के लोग आधी संख्या में रहते हैं। इसलिए गांव और शहरी आबादी में गुर्जर बिरादरी का ही दबदबा है। यही कारण है कि विधानसभा चुनाव के वक्त हर पार्टी गुर्जर प्रत्याशी को ही मैदान में उतारती रही है।
बड़ा निराला है यहां का इतिहास
पुराना शहर है। बाहरी लोग अभी यहां नहीं बसे हैं। गुर्जर, ठाकुर, एससी, जाट, ब्राह्मण समेत अन्य जातियां हैं। यहां ध्यान देने की बात है कि पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त ठाकुरों और आधे मुस्लिमों ने कांग्रेस प्रत्याशी धीरेंद्र सिंह का समर्थन किया और गुर्जरों ने बसपा प्रत्याशी वेदराम भाटी को अपना नेता मान लिया।
नए परिसीमन के बाद सिकंदराबाद विधानसभा में ग्रेनो, नोएडा तक का हिस्सा शामिल हो चुका है। शहर के वोटों में मुस्लिम का दबदबा है लेकिन देहात की तरफ गुर्जर समेत अन्य जातियां भी जुड़ गई हैं।
यही कारण है कि हाल ही में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रैली की थी जिसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम वोटरों को लुभाना था। हालांकि मुलायम सिंह, राजनाथ सिंह और मायावती की भी यहां शीघ्र ही रैलियां होनी हैं। जबकि खुर्जा में शहरी वोटों में मुस्लिम, बनिया और सरदारों की संख्या अधिक है। लेकिन जैसे ही देहात की तरफ बढ़ेंगे तो ठाकुर, जाट, गुर्जर समेत अन्य जातियां मिल जाएंगी।