केस में गवाह के रूप में काफी खतरनाक होते हैं बच्चे : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने माना है कि गवाह के रूप में बच्चे खतरनाक होते है, क्योंकि उन्हें आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। अदालत को जब तक उनके द्वारा दिए गए साक्ष्य को स्वीकार नहीं करना चाहिए जब तक गवाह की सच्चाई की सावधानी से पूर्वक जांच न की जाए।
न्यायमूर्ति जी.एस सिस्तानी व न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल की खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत के न्यायाधीश ही इस तरह के एक गवाह की परीक्षा, बच्चे की क्षमता और बुद्धि को समझने के दायित्व को निभा सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि यह एक स्थापित सिद्धांत है कि बच्चे गवाहों के तौर पर खतरनाक होते है, वे लचीला होने के साथ आसानी से प्रभावित हो जाते है। खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ऐसे साक्ष्यों को सावधानी से जांचने के बाद ही उनकी गवाही स्वीकारती है कि मामले को प्रभावित नहीं किया गया।
जिरह के दौरान बच्ची ठीक से नहीं दे सकी थी बयान
खंडपीठ ने हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा चार लोगों को बरी करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। याची के भाई की वर्ष 2008 में साजिश के तहत हत्या कर दी गई थी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क रखा कि निचली अदालत ने मार्च 2012 में चार आरोपियों को गलत तरीके से बरी किया था। उन्होंने कहा इस मामले में मृतक की बेटी चश्मदीद गवाह थी और उसके बयान को नकारा नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि सुनवाई के दौरान दर्ज बच्ची के बयान को सबूत के तौर पर विश्वसनीय नहीं पाया गया। इसके अलावा गवाह बचाव पक्ष की जिरह के दौरान सही जवाब नहीं दे पाई थी। यही कारण है कि ट्रायल कोर्ट ने उसके बयान को नहीं माना था।