आवारा कुत्तों से नहीं निपट पा रही है सरकार
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राजधानी में आवारा कुत्तों के आतंक व उससे निपटने का कोई उपाय न होने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार, तीनों एमसीडी, एनडीएमसी व दिल्ली छावनी बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
इस मामले को लेकर दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि राजधानी में हर 50 व्यक्तियों के पीछे एक आवारा कुत्ता है और कुत्तों के काटने की बीमारी पर प्रति वर्ष करोड़ों रुपये का खर्च आ रहा है।
न्यायमूर्ति बीडी अहमद व न्यायमूर्ति संजीव सचदेव की खंडपीठ ने सभी पक्षों को 13 मई तक यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि आवारा कुत्तों की जनसंख्या को रोकने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं।
इसके अलावा आवारा कुत्तों को पकड़ने की क्या नीति है। खंडपीठ ने यह निर्देश न्याय भूमि नामक संगठन के अध्यक्ष बीबी शरण द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
हर दिन बढ़ रही है आवारा कुत्तों की संख्या
याची के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राजधानी में प्रति दिन आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। 28 जून 2014 के सर्वे के मुताबिक राजधानी में पांच लाख आवारा कुत्ते हैं और सरकार व स्थानीय निकाय उनकी संख्या पर रोकथाम लगाने का कोई प्रयास नहीं कर रही।
रिकॉर्ड के अनुसार 12 अस्पतालों से आरटीआई के जवाब में पता चला कि इनमें प्रतिदिन कुत्तों के काटने के करीब 300 मामले आ रहे हैं। यदि 50 अस्पतालों की बात करे तो यह आंकड़ा 800 का बैठता है।
रैबीज वैक्सीन पर 140 रुपये का खर्च आता है यानि प्रति माह 33 लाख 60 हजार रुपये का खर्च बिना कारण वहन किया जाता है। यदि कुत्तों को पकड़ कर एक स्थान पर रखा जाए व उनके खाने के लिए होटल, ढाबों इत्यादि से बचा हुआ खाना एकत्रित कर प्रदान किया जाए तो इस बीमारी के अलावा आवारा कुत्तों से बचा जा सकता है।