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जानिए, किस हालत में है शहीदों का गांव

Fri, 15 Aug 2014 08:15 AM IST
Updated Fri, 15 Aug 2014 08:15 AM IST
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Independence special story of faridabad

जिस गांव के सैकड़ों वीरों ने अपने हौसलों से दुश्मनों के छक्के छुड़ाकर अपनी शहादत का परिचय दिया उन्हीं के गांव की, देश व प्रदेश की नुमाइंदगी करने वाले लोग इस कदर बेकद्री करेंगे, सपने में भी नहीं सोचा होगा। लेकिन यह हकीकत है। हम बात कर रहे हैं वीरों के गांव तिगांव की, जो आजादी के 68 साल बाद भी विकास और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।

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कहने को तो बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं बन गई। फार्म हाउस बन गए। कुछ लोगों के पास लंबी-लंबी गाड़ियां आ गई। लेकिन सड़कों की हालत आज भी नहीं सुधरी। इस गांव की अधिकांश सड़कों पर हमेशा जलभराव की स्थिति बनी रहती है। पानी भरा होने के कारण सड़कों पर दो से तीन फुट तक गढ्ढे बन गए हैं। पूरे गांव में पानी निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। यह हाल उस गांव का है जहां से 15 साल तक केंद्रीय सड़क, परिवहन एवं जहाजरानी राज्यमंत्री कृष्णपाल गुर्जर नेतृत्व कर चुके हैं।

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ऐसी हालत में क्यों हैं यहां के युवा

Independence special story of faridabad

देश की राजधानी से महज 25 किलोमीटर दूर बसे इस ऐतिहासिक गांव के युवाओं के पास रोजगार नहीं है। यहां के पढ़े-लिखे 70 प्रतिशत युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं। बड़ौली गांव निवासी वीर पाल गुर्जर व शहीद दलेल सिंह नागर के परिजन राजेश कुमार का कहना है कि आजादी के बाद से अब तक किसी जनप्रतिनिधि ने शहीदों के परिवार के प्रति कोई हमदर्दी नहीं दिखाई। परिवार को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। इस गांव की कुल आबादी करीब 12 हजार है। पढ़ लिखकर भी सरकारी नौकरी न मिलने से युवा मारे-मारे फिर रहे हैं।

इस गांव की करीब 80 प्रतिशत आबादी किसानी से अपना गुजारा कर रहे हैं। अर्थात उनकी आय का एकमात्र साधन खेती है। तिगांव के पंचायत मेंबर सुंदर नागर का कहना है कि जनप्रतिनिधियों की अनदेखी के कारण ही वीरों के इस गांव की दयनीय स्थिति है। लोग किसी तरह अपना परिवार पाल रहे हैं। रही बात शहीदों के परिवार की तो उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। पिछले 15 सालों तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल गुर्जर ने भी ऐतिहासिक गांव की न तो दशा सुधार पाए और न की कोई विकास कार्य कराया।

भारत-चीन व पाकिस्तान युद्ध के भी रहे गवाह

Independence special story of faridabad

इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो वर्ष 1914 से 1919 के बीच हुए प्रथम विश्वयुद्ध में इस गांव से अकेले 185 जांबाजों ने हिस्सा लिया था जिनमें 31 वीरों ने अपने प्राण न्यौछावर किए थे। इनमें हुकम सिंह, चिमन, डूंगर सिंह, नैन सिंह, खचेरू, डुलीचंद, टीला, लेखराम, शिवचरण, पूरन, राम प्रसाद, हरबंस, शिवदयाल, पदम, लाल सिंह, अशरफ, हरबाल, लिखीराम, सुरजन, नाहर सिंह, बाली, अमीचंद, जोधा, चंदन, बोहारू व मीर सिंह आदि थे। 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्वयुद्ध में इस गांव से रतन लाल, राधे, चंदरू, यादराम, रामजी लाल और होराम ने अपने प्राण न्यौछावर किए थे।

वर्ष 1962 में भारत- चीन के बीच हुए युद्ध में तिगांव के लांसनायक शिव नारायण, बलबीर सिंह व टेकचंद ने अपना बलिदान दिया था।1965 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में हवलदार ओम प्रकाश, 13 अप्रैल 1984 में सियाचीन में भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन मेघदूत में ग्रेनेडियर रामवीर सिंह ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए शहादत दी थी।

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