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पाक से भागकर दिल्ली आई मोहनी की आपबीती, 35 साल में पहली बार देखी होली और दिवाली
Sun, 15 Dec 2019 07:50 PM IST
Avdhesh Kumar
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Sun, 15 Dec 2019 07:50 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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हिंदू समुदाय में दिवाली और होली दो सबसे बड़े त्योहार हर साल हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं, लेकिन पाकिस्तान में मौजूद हजारों हिंदू परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें कभी भी ये पर्व मनाने का मौका ही नहीं दिया जाता। ये खुलासा दिल्ली के मजनू का टीला स्थित हिंदू शरणार्थी शिविर में दो वर्ष से रह रहीं मोहनी ने किया है। उनका कहना है कि उनकी आयु 36 वर्ष है।
जन्म से अब तक उन्होंने कभी भी पाकिस्तान में दिवाली या होली पर्व नहीं मनाया। घरवालों से उन्हें पता चलता था कि इन दोनों पर्व पर भारत में क्या-क्या होता है, लेकिन खौफ और हिंदुओं पर अत्याचारों के कारण पाकिस्तान में ये त्योहार कभी नहीं मनाए गए। पाकिस्तान के जुल्मों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां हिंदू परिवार अपने घरों में छिपकर भगवान की पूजा करते हैं।
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जन्म से अब तक उन्होंने कभी भी पाकिस्तान में दिवाली या होली पर्व नहीं मनाया। घरवालों से उन्हें पता चलता था कि इन दोनों पर्व पर भारत में क्या-क्या होता है, लेकिन खौफ और हिंदुओं पर अत्याचारों के कारण पाकिस्तान में ये त्योहार कभी नहीं मनाए गए। पाकिस्तान के जुल्मों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां हिंदू परिवार अपने घरों में छिपकर भगवान की पूजा करते हैं।
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मोहनी बताती हैं कि वर्ष 2017 में पहली बार भारत आई थीं। उनके साथ दो बच्चे और पति महेश भी थे। ये लोग तीर्थयात्रा के बहाने से भारत आए और वहां से सीधे दिल्ली के मजनू का टीला स्थित शरणार्थी शिविर पहुंचे। शिविर में इनके परिजन 2011 से रह रहे थे। पहली बार उन्होंने 2018 में दिवाली और होली का त्योहार मनाया।
मोहनी का कहना है कि बचपन से ही घर में उन्हें बंद रखा जाता था। माता-पिता न उन्हें स्कूल भेजते थे और न ही घर से बाहर निकलने देते थे। उन्हें डर रहता था कि कहीं उनकी बेटी को कोई उठाकर ना ले जाए। करीब 18 वर्ष की आयु में उनका विवाह महेश से हुआ, जिसका परिवार के साथ आना-जाना लगा रहता था।
मोहनी का कहना है कि बचपन से ही घर में उन्हें बंद रखा जाता था। माता-पिता न उन्हें स्कूल भेजते थे और न ही घर से बाहर निकलने देते थे। उन्हें डर रहता था कि कहीं उनकी बेटी को कोई उठाकर ना ले जाए। करीब 18 वर्ष की आयु में उनका विवाह महेश से हुआ, जिसका परिवार के साथ आना-जाना लगा रहता था।
शादी के बाद भी उनका परिवार खौफ में था। वे जब भी घर से बाहर निकलती थीं तो पूरा शरीर ढंका रहता था। वहां उन्हीं की भाषा में दुआ-सलाम करना भी सीख चुकी थीं। कई बार पड़ोसियों से बातचीत में ये डर लगता था कि कहीं उनके मुंह से हिंदू वाली बात ना निकल जाए।
वे कई वर्षों तक सिंध के नजदीक एक गांव में पहचान छिपाकर रहे थे। मोहनी कहती हैं कि वे वापस पाकिस्तान नहीं जाना चाहती हैं। परिवार के साथ भारत में ही रहना चाहती हैं, जहां कौमी एकता की मिसाल देखने को मिलती है।
वे कई वर्षों तक सिंध के नजदीक एक गांव में पहचान छिपाकर रहे थे। मोहनी कहती हैं कि वे वापस पाकिस्तान नहीं जाना चाहती हैं। परिवार के साथ भारत में ही रहना चाहती हैं, जहां कौमी एकता की मिसाल देखने को मिलती है।