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हाईकोर्ट ने रद्द किया हजरतपुर का भूमि अधिग्रहण
अमर उजाला, इलाहाबाद/ग्रेनो
Updated Thu, 15 May 2014 10:54 PM IST
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हाईकोर्ट ने नोएडा के हजरतपुर गांव में किसानों की भूमि का अधिग्रहण बृहस्पतिवार को रद्द कर दिया। अधिग्रहण की अधिसूचना वर्ष 2009 में औद्योगिक विकास के नाम पर जारी की गई थी।
सरकार ने भूमि अधिग्रहीत कर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण को सौंप दी। हजरतपुर के उदयवीर सहित 35 से अधिक किसानों ने इसके खिलाफ याचिका दायर कर रखी थी।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता एनपी सिंह और के.के. सिंह के मुताबिक सरकार ने सुनियोजित औद्योगिक विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत अर्जेंसी क्लॉज का इस्तेमाल करते हुए जमीन अधिग्र्रहीत की थी। यहां अर्जेंसी क्लॉज के प्रयोग की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने अधिसूचना को रद्द कर दिया है।
वर्ष 2009 में हजरतपुर गांव की करीब 73 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहीत की गई थी। उसमें से 20 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण कोर्ट ने रद्द कर दिया है। जिन किसानों ने मूल और 64 फीसदी मुआवजा उठाया था उनकी सुनवाई 21 मई को होगी।
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अधिग्रहण रद्द होने से किसानों में खुशी है। कोर्ट ने प्राधिकरण और किसानों को अपना-अपना पक्ष 21 से पहले अदालत के समक्ष पेश करने का आदेश दिया है जिससे सुनवाई हो सके।
अधिवक्ताओं ने बताया कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने अदालत को गुमराह किया और कहा कि उन्होंने हजरतपुर को विकसित कर दिया है। अधिग्रहीत की गई पूरी जमीन पर प्राधिकरण का कब्जा है, लेकिन किसानों की ओर से फोटोग्राफी कराकर अदालत में पेश की गई।
उसमें साफ दिखा कि जमीन पर किसानों का कब्जा है और फसल खड़ी है और कहीं पर कोई विकास नहीं किया गया है। अदालत ने माना कि उक्त जमीन पर प्राधिकरण का न कब्जा है और न ही कोई विकास किया है।
मामला एक नजर में
साल 2009 में हजरतपुर के किसानों की 73 हेक्टेयर जमीन का ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने अधिग्रहण किया था। 14 दिसंबर 2009 में बोड़ाकी के किसान उदयवीर एडवोकेट, अनिल एडवोकेट, महेंद्र भाटी, महेंद्र एडवोकेट, दिनेश भाटी, अजयपाल प्रधान, बिजेंद्र मंत्री और सरजीत समेत करीब 35 किसानों ने याचिका दायर की थी।
किसानों का आरोप था कि प्राधिकरण ने जमीन अधिग्रहण के दौरान उनकी आपत्ति नहीं सुनी। इसी मुद्दे पर हाईकोर्ट ने किसानों को स्टे दे दिया और मामला चल रहा था।
मुआवजा उठाने वाले किसानों की अलग सुनवाई
अदालत ने 15 मई को हुई सुनवाई में उन किसानों को अलग रखा है, जिन्होंने मूल और 64.7 फीसदी मुआवजा ले लिया है। जबकि ऐसे किसानों की फाइल अलग है जिन्होंने केवल मूल मुआवजा उठाया था।
इन दोनों मामलों की सुनवाई 21 मई को होगी, लेकिन उससे पहले हजरतपुर की वीडियोग्राफी कराई जाएगी और उसमें दिखाया जाएगा कि हजरतपुर में विकास हुआ है या नहीं।
लौटाना पड़ सकता है मुआवजा
अगर अदालत ने हजरतपुर की सारी जमीन का अधिग्रहण निरस्त कर दिया तो किसानों को मूल और 64.7 फीसदी मुआवजा वापस करना होगा। जिसके बाद प्राधिकरण जमीन को दोबारा एक्वायर करेगा या फिर समझौता करके किसानों की जमीन की सीधे रजिस्ट्री कर सकेगा।
डीएमआईसी प्रोजेक्ट भी खटाई में पड़ा
हजरतपुर गांव की जमीन का जो अधिग्रहण निरस्त हुआ है, उसके कुछ हिस्से उस स्थान पर आए हैं जहां पर ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण बोड़ाकी के किसानों को डीएमआईसी के लिए शिफ्ट कर रहा है।
चूंकि प्राधिकरण जिस जमीन पर किसानों को शिफ्ट कर रहा था, उसमें करीब 70 फीसदी जमीन हजरतपुर की है। बोड़ाकी की जमीन अभी अधिग्रहीत नहीं हुई है। करीब 15 फीसदी जमीन घोड़ी-बछेड़ा की है, जो प्राधिकरण के कब्जे में है।
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सरकार ने भूमि अधिग्रहीत कर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण को सौंप दी। हजरतपुर के उदयवीर सहित 35 से अधिक किसानों ने इसके खिलाफ याचिका दायर कर रखी थी।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता एनपी सिंह और के.के. सिंह के मुताबिक सरकार ने सुनियोजित औद्योगिक विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत अर्जेंसी क्लॉज का इस्तेमाल करते हुए जमीन अधिग्र्रहीत की थी। यहां अर्जेंसी क्लॉज के प्रयोग की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने अधिसूचना को रद्द कर दिया है।
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वर्ष 2009 में हजरतपुर गांव की करीब 73 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहीत की गई थी। उसमें से 20 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण कोर्ट ने रद्द कर दिया है। जिन किसानों ने मूल और 64 फीसदी मुआवजा उठाया था उनकी सुनवाई 21 मई को होगी।
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अधिग्रहण रद्द होने से किसानों में खुशी है। कोर्ट ने प्राधिकरण और किसानों को अपना-अपना पक्ष 21 से पहले अदालत के समक्ष पेश करने का आदेश दिया है जिससे सुनवाई हो सके।
अधिवक्ताओं ने बताया कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने अदालत को गुमराह किया और कहा कि उन्होंने हजरतपुर को विकसित कर दिया है। अधिग्रहीत की गई पूरी जमीन पर प्राधिकरण का कब्जा है, लेकिन किसानों की ओर से फोटोग्राफी कराकर अदालत में पेश की गई।
उसमें साफ दिखा कि जमीन पर किसानों का कब्जा है और फसल खड़ी है और कहीं पर कोई विकास नहीं किया गया है। अदालत ने माना कि उक्त जमीन पर प्राधिकरण का न कब्जा है और न ही कोई विकास किया है।
मामला एक नजर में
साल 2009 में हजरतपुर के किसानों की 73 हेक्टेयर जमीन का ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने अधिग्रहण किया था। 14 दिसंबर 2009 में बोड़ाकी के किसान उदयवीर एडवोकेट, अनिल एडवोकेट, महेंद्र भाटी, महेंद्र एडवोकेट, दिनेश भाटी, अजयपाल प्रधान, बिजेंद्र मंत्री और सरजीत समेत करीब 35 किसानों ने याचिका दायर की थी।
किसानों का आरोप था कि प्राधिकरण ने जमीन अधिग्रहण के दौरान उनकी आपत्ति नहीं सुनी। इसी मुद्दे पर हाईकोर्ट ने किसानों को स्टे दे दिया और मामला चल रहा था।
मुआवजा उठाने वाले किसानों की अलग सुनवाई
अदालत ने 15 मई को हुई सुनवाई में उन किसानों को अलग रखा है, जिन्होंने मूल और 64.7 फीसदी मुआवजा ले लिया है। जबकि ऐसे किसानों की फाइल अलग है जिन्होंने केवल मूल मुआवजा उठाया था।
इन दोनों मामलों की सुनवाई 21 मई को होगी, लेकिन उससे पहले हजरतपुर की वीडियोग्राफी कराई जाएगी और उसमें दिखाया जाएगा कि हजरतपुर में विकास हुआ है या नहीं।
लौटाना पड़ सकता है मुआवजा
अगर अदालत ने हजरतपुर की सारी जमीन का अधिग्रहण निरस्त कर दिया तो किसानों को मूल और 64.7 फीसदी मुआवजा वापस करना होगा। जिसके बाद प्राधिकरण जमीन को दोबारा एक्वायर करेगा या फिर समझौता करके किसानों की जमीन की सीधे रजिस्ट्री कर सकेगा।
डीएमआईसी प्रोजेक्ट भी खटाई में पड़ा
हजरतपुर गांव की जमीन का जो अधिग्रहण निरस्त हुआ है, उसके कुछ हिस्से उस स्थान पर आए हैं जहां पर ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण बोड़ाकी के किसानों को डीएमआईसी के लिए शिफ्ट कर रहा है।
चूंकि प्राधिकरण जिस जमीन पर किसानों को शिफ्ट कर रहा था, उसमें करीब 70 फीसदी जमीन हजरतपुर की है। बोड़ाकी की जमीन अभी अधिग्रहीत नहीं हुई है। करीब 15 फीसदी जमीन घोड़ी-बछेड़ा की है, जो प्राधिकरण के कब्जे में है।