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पितृ पक्ष के नाम पर भोज, जीवित मां-बाप की नहीं खोज
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
Updated Sun, 18 Sep 2016 11:47 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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किसी अपने को तलाशती बूढ़ी नजर जो दूर तक जाकर वापस लौट आती है। किसे अपना कहें, किससे दिल की बात करें। सिर टिकाने को न किसी का कंधा है और न ही कोई इन बूढ़ों की लाठी है। न अब आंखों में किसी के लिए आंसू रहे न होठों पर किसी बात के लिए मुस्कराहट रह गई है। समय तो बस गुजारने भर के लिए रह गया है।
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खुद से ही खुद को दिलासा देते हैं या फिर एक दूसरे का दर्द देखकर तसल्ली कर लेते हैं। कष्टों में जी रहे इन ‘बागबां’ पर किसी को कुसूरवार नहीं ठहराते, सिर्फ अपनी किस्मत का धोखा मान सब कुछ सह रहे हैं।पितृ पक्ष शुरू होते ही लोग अपने मृत परिजनों का आशीर्वाद पाने को ब्राह्मण भोज, कौवा को रोटी देने साथ ही अनेक तमाम कर्मकांड करने में जुट जाते हैं।
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मृतकों के लिए यह सब करने वाले लोगों के पास घर के जीवित बुजुर्गों के न तो घर में जगह बची है और न ही दिल में। महानगर में एक-दो नहीं बल्कि कई ऐसे बुजुर्ग हैं, जो बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। किसी को बेटे-बहू ने धक्के मार कर घर से बेघर कर दिया। तो कोई मन की शांति पाने खातिर परिवार के पास नहीं रहना चाहता।
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वृद्धा आश्रम में रह रहे बीमार बुजुर्ग दंपति कहते हैं यह किसी का नहीं भाग्य का कसूर है जो वे लोग आश्रम में रहने को मजबूर हैं। दो बेटा बहू होने के बावजूद हालात कुछ ऐसे बनें कि बेटे और बहू ने उन्हें आश्रम में ठहरा दिया। आश्रम का किराया बेटे ही दे रहे हैं लेकिन साथ रखने को राजी नहीं हैं।
रेलवे से रिटायर जोगिंदर पाल का शहर में अपना घर है, लेकिन पिछले कई वर्षों से वे आश्रम में रह रहे हैं। इकलौते बेटे की शादी के बाद घर के हालात कुछ ऐसे बने कि उन्हें अपना ही घर छोड़ना पड़ा। आंखाें में छलकते आंसुओं के साथ बस इतना ही कहते हैं कि पत्नी होती तो ये दिन न देखना पड़ता।
आज अकेला हूं, तकलीफ उस समय बढ़ जाती है जब बीमारी के हालात में भी एक गिलास पानी लेने को खुद उठना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर अपना फ्लैट होते हुए भाी अकेलापन दूर करने की खाति रिटायर शिक्षिका श्रद्धा गुप्ता ने वृद्धा आश्रम का सहारा लिया। वे नहीं चाहती कि बेटे बहू के साथ रहकर उनके लाइफ को डिस्टर्ब करें।
दूर रहकर आपसी रिश्ता कायम रखने की खातिर उन्होंने यहां का सहारा लिया। ये दो केस तो बुजुर्गों का दर्द बयां करने को बानगी भर है। ऐसे कितने ही बुजुर्ग अकेले रह रहे हैं जिन्हें उनके अपनों ने ठुकराया है लेकिन फिर भी वे अपनाें के खिलाफ कुछ नहीं बोलना चाहते।
जीते जी बच्चों के नाम न करें प्रॉपर्टी: रैना
बदलते समाज के सोच और विचार के साथ अब बुजुर्गों को भी अपने भविष्य के लिए दिमागी तौर पर तैयार होना होगा। अब बच्चों के भरोसे जीवन बिताने की बजाय अपने आर्थिक हालात को मजबूत करने की प्लानिंग ही वृद्धावस्था में बड़ा सहारा बनती है। ऐसे में कभी भी अभिभावकों को अपने जीवन में बच्चों के नाम प्रोपर्टी करने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए।
बुढ़ापे में भी पैसा ही सहारा बनता है। बच्चों के मोह में अगर यह चूक होती है, तो इसका खामियाजा अक्सर बुजुर्ग मां-बाप को भुगतना पड़ता है। -डा. जेएल रैना, समाजशास्त्री