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न झंडे, न बिल्ले...यादों में ही रह गया चुनाव प्रचार

Thu, 02 Feb 2017 12:36 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद Updated Thu, 02 Feb 2017 12:36 AM IST
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No flags, no longer in the memories campaigning badge ...
लोगो - फोटो : अमर उजाला
निर्वाचन आयोग की सख्ती के चलते इस बार पहले चरण का चुनावी माहौल फीका-फीका का लग रहा है। न झंडे-बैनर दिख रहे हैं और न ही प्रत्याशियों के कार्यालयों पर ढोल-नगाड़ों की थाप सुनाई दे रही है। लाउड स्पीकर का शोर तो जैसे गुजरे जमाने की बात बन चुका है।
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प्रत्याशी हाथ जोड़कर घर-घर जनसंपर्क करने के साथ सोशल साइट्स के जरिए प्रचार कर रहे हैं। पहले चरण में चुनाव प्रचार के लिए अब मात्र आठ दिन बाकी हैं। 9 फरवरी की शाम पांच बजे चुनाव प्रचार थम जाएगा।
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बावजूद इसके ऐसा महसूस ही नहीं हो रहा कि गाजियाबाद में 11 फरवरी को मतदान होने जा रहा है। अमर उजाला ने दशकों से चुनाव देख रहे बुजुर्गों से बातचीत की। बुजुर्ग चुनाव आयोग की सख्ती को सही ठहराते हैं, हालांकि यह भी कहते हैं कि कम से कम पता तो चलना चाहिए कि चुनाव है। 
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पहले शोरशराबा होने से पता चलता था कि चुनाव हो रहा है। इस बार तो पता ही नहीं चल रहा है कि 11 फरवरी को मतदान होना है। जनता और प्रत्याशी जैसे दोनों ही शांत से बैठे हुए हैं।
 - संतराम, मोदीनगर

पहले चुनाव के दौरान लोग जमकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूमते थे। लाउड स्पीकर की आवाज गलियों में गूंजती रहती थी लेकिन अब बिल्कुल सन्नाटा है। 
- प्रेमदत्त अग्रवाल, मोदीनगर

एक वक्त था जब चारों ओर चुनावी माहौल नजर आता था। अब तो पता ही नहीं चलता है कि चुनाव कब आया और चला गया। सोशल साइट्स के प्रचार के चलते झंडे, बैनर और बिल्लों का दौर खत्म होने लगा है।’ 
-  बीएम त्यागी, मुरादनगर

चुनाव तो बचपन में देखने को मिलता था। मोहल्ले में किसी भी प्रत्याशी की प्रचार रिक्शा आती थी तो उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगते थे। लालच सिर्फ एक बिल्ले को होता था। रंगबिरंगे बिल्ले एकत्र करने का भी शौक था।

- राजवीर शर्मा, सदरपुर

चुनाव के दौरान बाजार तक झंडे, पोस्टर और बैनरों से सज जाते थे। एक ही मकान पर कई-कई पार्टियों के झंडे दिखते थे। अब तो इक्का-दुक्का मकान पर ही झंडा नजर आता है।
- अनीता गोयल, गाजियाबाद
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