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Ghaziabad News: एमएमजी के डॉ. आलोक की मौत, इलाज में लापरवाही का आरोप
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गाजियाबाद। नई दिल्ली स्थित फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट में हृदय की सर्जरी के बाद एमएमजी अस्पताल के फिजिशियन डॉ. आलोक रंजन (47) की सोमवार देर रात 12:15 बजे मौत हो गई। परिजनों ने अस्पताल पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया है।
आलोक की पत्नी इंजीनियर निक्की प्रसाद ने अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक और चिकित्सा निदेशक को शिकायत देकर मामले की निष्पक्ष जांच कराने और उपचार से जुड़े सभी दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की है।
शिकायत के अनुसार डॉ. आलोक का उपचार कार्डियक सर्जन डॉ. शिव चौधरी की देखरेख में चल रहा था। 22 सितंबर को उनके एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट यानी हृदय के ऊपरी कक्षों के बीच की दीवार में छेद को बंद करने के लिए सर्जरी की गई थी।
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निक्की का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट नहीं कराया गया। इसके बाद मरीज की फेफड़ों से जुड़ी स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई और उनकी जान पर संकट आ गया।
रिपोर्ट में विरोधाभास का दावा
निक्की के मुताबिक, चिकित्सकों ने मरीज के नमूनों में क्लेबसिएला बैक्टीरिया मिलने की जानकारी दी थी। एक रिपोर्ट में बैक्टीरिया को कुछ महत्वपूर्ण दवाओं के प्रति संवेदनशील बताया गया, जबकि दूसरी रिपोर्ट में उसे एनडीएम पॉजिटिव और उन्हीं दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बताया गया। परिजनों ने दोनों रिपोर्टों में विरोधाभास का दावा करते हुए स्पष्टीकरण मांगा है। पत्नी ने अस्पताल प्रबंधन से ऑपरेशन के दस्तावेज, जांच रिपोर्ट, दवाओं का विवरण और संक्रमण से संबंधित सभी अभिलेख उपलब्ध कराने के साथ पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि परिवार मानसिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। उनकी छह साल की बेटी है। परिजनों ने शिकायत में कहा है कि न्याय के लिए जरूरत पड़ने पर वे सक्षम अधिकारियों के समक्ष भी मामला उठाएंगे।
प्रोटोकॉल के अनुसार हुई सर्जरी
इस मामले में फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली ने अपना पक्ष जारी किया है। इसमें कहा गया है कि डॉ. रंजन की न्यूनतम चीरा वाली हृदय संबंधी प्रक्रिया उपचार कर रही कार्डियक टीम ने स्थापित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार की थी। सर्जरी का निर्णय मरीज की उस समय की चिकित्सकीय स्थिति और उपलब्ध चिकित्सा इतिहास के आधार पर लिया गया। संबंधित समय पर चिकित्सकीय आकलन के अनुसार सर्जरी से पहले पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट कराना आवश्यक नहीं माना गया था। प्रक्रिया के बाद मरीज को शुरुआत में वेंटिलेटर से हटा दिया गया था, लेकिन बाद में उनकी सांस संबंधी स्थिति अचानक बिगड़ गई। अस्पताल ने बताया कि आगे की जांच के दौरान एडवांस बायोफायर जांच समेत अन्य मानक परीक्षण कराए गए। जांच में दवा प्रतिरोधी क्लेबसिएला निमोनिया संक्रमण की पुष्टि हुई। इसके बाद मरीज की चिकित्सीय स्थिति और संक्रमण की जांच के परिणामों के आधार पर लक्षित रोगाणुरोधी उपचार शुरू किया गया था।
आलोक की पत्नी इंजीनियर निक्की प्रसाद ने अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक और चिकित्सा निदेशक को शिकायत देकर मामले की निष्पक्ष जांच कराने और उपचार से जुड़े सभी दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की है।
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शिकायत के अनुसार डॉ. आलोक का उपचार कार्डियक सर्जन डॉ. शिव चौधरी की देखरेख में चल रहा था। 22 सितंबर को उनके एट्रियल सेप्टल डिफेक्ट यानी हृदय के ऊपरी कक्षों के बीच की दीवार में छेद को बंद करने के लिए सर्जरी की गई थी।
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निक्की का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट नहीं कराया गया। इसके बाद मरीज की फेफड़ों से जुड़ी स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई और उनकी जान पर संकट आ गया।
रिपोर्ट में विरोधाभास का दावा
निक्की के मुताबिक, चिकित्सकों ने मरीज के नमूनों में क्लेबसिएला बैक्टीरिया मिलने की जानकारी दी थी। एक रिपोर्ट में बैक्टीरिया को कुछ महत्वपूर्ण दवाओं के प्रति संवेदनशील बताया गया, जबकि दूसरी रिपोर्ट में उसे एनडीएम पॉजिटिव और उन्हीं दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बताया गया। परिजनों ने दोनों रिपोर्टों में विरोधाभास का दावा करते हुए स्पष्टीकरण मांगा है। पत्नी ने अस्पताल प्रबंधन से ऑपरेशन के दस्तावेज, जांच रिपोर्ट, दवाओं का विवरण और संक्रमण से संबंधित सभी अभिलेख उपलब्ध कराने के साथ पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि परिवार मानसिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है। उनकी छह साल की बेटी है। परिजनों ने शिकायत में कहा है कि न्याय के लिए जरूरत पड़ने पर वे सक्षम अधिकारियों के समक्ष भी मामला उठाएंगे।
प्रोटोकॉल के अनुसार हुई सर्जरी
इस मामले में फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली ने अपना पक्ष जारी किया है। इसमें कहा गया है कि डॉ. रंजन की न्यूनतम चीरा वाली हृदय संबंधी प्रक्रिया उपचार कर रही कार्डियक टीम ने स्थापित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार की थी। सर्जरी का निर्णय मरीज की उस समय की चिकित्सकीय स्थिति और उपलब्ध चिकित्सा इतिहास के आधार पर लिया गया। संबंधित समय पर चिकित्सकीय आकलन के अनुसार सर्जरी से पहले पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट कराना आवश्यक नहीं माना गया था। प्रक्रिया के बाद मरीज को शुरुआत में वेंटिलेटर से हटा दिया गया था, लेकिन बाद में उनकी सांस संबंधी स्थिति अचानक बिगड़ गई। अस्पताल ने बताया कि आगे की जांच के दौरान एडवांस बायोफायर जांच समेत अन्य मानक परीक्षण कराए गए। जांच में दवा प्रतिरोधी क्लेबसिएला निमोनिया संक्रमण की पुष्टि हुई। इसके बाद मरीज की चिकित्सीय स्थिति और संक्रमण की जांच के परिणामों के आधार पर लक्षित रोगाणुरोधी उपचार शुरू किया गया था।