{"_id":"58a1ee0c4f1c1b5f7ed84b91","slug":"in-these-old-eyes-your-sorrow-is-so","type":"story","status":"publish","title_hn":"तुम्हारा गम बहुत है.... इन बूढ़ी निगाहों में","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
तुम्हारा गम बहुत है.... इन बूढ़ी निगाहों में
ब्यूरो , अमर उजाला गाजियाबाद
Updated Tue, 14 Feb 2017 12:43 AM IST
विज्ञापन
sorrow
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आज बाग-बगीचे, मॉल-मल्टीप्लेक्स, मेट्रो और तमाम ऐसी जगहों पर एक दूसरे का हाथ थामे जिंदगी से लबरेज कितने ही जोड़े दिख जाएंगे। वेलेंनटाइन डे की खुशी में वक्त से बेपरवाह चहकते हुए चेहरों के बीच एक कसक भी होगी। यह कसक शहर की भीड़भाड़ से दूर उन बूढ़ी आंखों में दिखेगी, जो बेसाख्ता बहती रहती हैं।
विज्ञापन
उस एक दर्द से जिसने इनसे इनका साथी छीन लिया... और जिनको इन्होंने अपने आखिरी वक्त का सहारा समझा था, उन्होंने इन्हें छोड़ दिया उस स्याह सफर में जहां उम्मीद का सूरज तक नहीं उगता। हम बात कर रहे हैं उन बुजुर्गों की जो जीवन के अंतिम पड़ाव में बिना साथी के वृद्धाश्रम में अपने दिन काट रहे हैं।
विज्ञापन
प्रताप विहार स्थित बालाजी आश्रम में रहने वाले जोगिंदर पाल अपनी पत्नी की फोटो को ही बाकी का जीवन काटने का सहारा बताते हैं, वहीं एक बुजुर्ग महिला अपने पति का जिक्र आते ही इतनी भावुक हो उठती हैं कि कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं होतीं।
विज्ञापन
रेलवे में काम करने वाले जोगिंदर पाल 2007 में रिटायर हुए और रिटायरमेंट के बाद ही इनको अपने घर से भी रिटायर कर दिया गया। पत्नी की मृत्यु के बाद अपने ही बेटे-बहू ने गलत इल्जाम लगाकर घर से निकाल दिया, जिसके बाद जोगिंदर पाल यहां वृद्धाश्रम आ गए।
जोगिंदर पाल कहते हैं कि उन्हें समय में वेलेंटाइन डे कोई नहीं मनाता था, लेकिन हम जब भी मिलते थे, वही दिन हमारे लिए खास होता था। आज तो उनकी (पत्नी) यह फोटो और साथ गुजारे पल ही जीने का सहारा हैं।
वहीं, बैंक कर्मी प्रमोद बताते हैं कि पत्नी जब साथ होती है तो उसकी कद्र नहीं होती लेकिन जब वह जीवन से चली जाती है, तब उसकी अहमियत का अहसास होता है। प्रमोद की दो बेटियां ही थीं और उन्होंने रिटायरमेंट के बाद अनाथ आश्रम से एक बच्चा गोद लेकर उसी के सहारे खुशी-खुशी जीवन जीने की योजना बनाई थी
लेकिन बीच मझधार में उनकी पत्नी उन्हें अकेला छोड़कर चली गईं और उनके हिस्से रह गया तो यह वृद्धाश्रम। वहीं अपने जवानी के दिनों को याद करते हुए रोशन लाल ने बताया कि उस समय न मोबाइल थे, न व्हाट्एप। उस समय अपने प्यार के संदेश को बड़ी कठिनाइयों से अपने प्रिय तक पहुंचाना होता था।
उन्होंने बताया कि वह एक पर्ची पर अपने संदेश लिखकर गुलेल से छत पर फेंका करते थे, हालांकि उसमें पकड़े जाने का भी डर रहता था।वृद्धाश्रमों में न जाने ऐसे कितने बुजुर्ग रह रहे हैं, जो अपने आखिरी पड़ाव में अकेले हैं। जीवन की सच्चाई के साथ। वेलेंटाइन डे का एक रंग यह भी है। काश, इन बुजुर्गों के चेहरे पर भी कोई खुशी के रंग लगा देता।
बड़ी हसरत से ताकती हैं बूढ़ी निगाहें देर तलक
क्यों कोई बेटा इस गली में लौटकर वापस नहीं आता....