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निविदा में पास, गुणवत्ता में फेल हो गया ‘निगम का डस्टबिन’

Tue, 23 May 2017 10:37 PM IST
अमर उजाला, गाजियाबाद
अमर उजाला, गाजियाबाद Updated Tue, 23 May 2017 10:37 PM IST
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In the tender, the quality failed in the 'dustbin of the corporation'
कूड़ेदान - फोटो : amar ujala

राजीव शर्मा

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गाजियाबाद। स्वच्छ भारत मिशन के तहत खरीदे जा रहे डस्टबिन गुणवत्ता की परीक्षा में फेल हो गए हैं। खास बात यह है कि नगर निगम अफसरों ने निविदा में इन्हें पास कर दिया था। सैंपल के तौर पर मंगाए गए डस्टबिन को जब चीफ इंजीनियर ने दबाव डालकर दिखाया तो वह टूट गया।

ऐसे डस्टबिन खरीदे गए तो 48.50 लाख की केंद्र सरकार की रकम फिर बर्बाद हो जाएगी। इससे पहले सड़कों पर लगाने के लिए खरीदे गए डस्टबिन में भी बड़ा घोटाला सामने आ चुका है।
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केंद्र सरकार घरों से ही गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग छांटने की प्लानिंग कर रही है।

लोगों में जागरूकता लाने के लिए नगर निगम केंद्र सरकार के फंड से 12 लीटर के दो लाख डस्टबिन खरीदने की तैयारी है। यह दो लाख डस्टबिन एक लाख घरों में निशुल्क रखवाए जाएंगे। नगर निगम ने डस्टबिन खरीद के लिए टेंडर कॉल किए थे।
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केंद्र सरकार की ओर से एक डस्टबिन की कीमत अधिकतम 64 रुपये रखी गई है। निगम के टेंडर में एक फर्म ने महज 48.50 रुपये की दर से डस्टबिन की आपूर्ति का दावा किया है। सबसे कम रेट होने पर निगम ने इस फर्म का टेंडर स्वीकृत कर लिया है।

ऐसे खुली गुणवत्ता की पोल
इस फर्म के पदाधिकारी डस्टबिन के दो सैंपल लेकर चीफ इंजीनियर आरके मित्तल के कार्यालय में सोमवार को पहुंचे थे। चीफ इंजीनियर डस्टबिन की गुणवत्ता की परखने के लिए उसे दबाकर देखने लगे। डस्टबिन को हाथों से थोड़ा सा दबाया तो वह टूट गया।

इस पर फर्म के पदाधिकारी ने गुणवत्ता खराब होने की बात नकारते हुए दूसरे डस्टबिन को दबाकर दिखाया, लेकिन वह भी टूट गया। डस्टबिन की आपूर्ति से पहले ही अफसरों के सामने गुणवत्ता की पोल खुलते देख फर्म के पदाधिकारियों ने गाड़ी से दूसरे डस्टबिन लाने की बात कही और कार्यालय से चले गए। एक घंटे बाद भी वह दूसरे डस्टबिन लेकर नहीं लौटे।

पहले भी हो चुका डस्टबिन घोटाला
नगर निगम में डस्टबिन खरीद के नाम पर पहले भी बड़ा घोटाला हो चुका है। महज तीन-साढ़े तीन हजार रुपये की कीमत वाले डस्टबिन को नगर निगम ने 9 हजार रुपये में खरीदा था। इनकी आपूर्ति भी हो चुकी थी और फर्म को आंशिक भुगतान भी कर दिया गया था।

मामला उजागर हुआ तो निगम अधिकारियों ने डस्टबिन की कीमत 9 हजार रुपये से घटाकर 4800 रुपये कर दी और फर्म को भुगतान कर दिया। यह मामला लखनऊ तक पहुंचा, निगम अधिकारियों ने भी कीमत घटाकर मान लिया कि ज्यादा कीमत पर खरीद के लिए वर्क आर्डर जारी हुआ था, बावजूद इसके किसी भी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।


अधिकारी बोले
दबाव डालने पर डस्टबिन के टूटने का मामला जानकारी में आया है। डस्टबिन को गुणवत्ता के मानकों पर परखा जाएगा। अगर गुणवत्ता खराब मिली तो आपूर्ति नहीं ली जाएगी। निर्धारित कमेटी की संस्तुति पर ही किसी भी फर्म से डस्टबिन खरीदे जाएंगे। - डीके सिन्हा, प्रभारी नगरायुक्त

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