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हाईकोर्ट सख्त : गेल अधिग्रहीत जमीन के मुआवजे पर 12 सप्ताह में निर्णय ले जिला समिति
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गाजियाबाद। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सैथली और आसपास के गांवों के किसानों की याचिका का निस्तारण करते हुए जिला समिति को निर्देश दिए हैं कि गेल की ओर से इस्तेमाल की जा रही जमीन के मुआवजे पर 12 सप्ताह के भीतर फैसला लिया जाए। किसानों का आरोप है कि गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल) वर्ष 2009 से बिना मुआवजा तय किए उनकी जमीन का उपयोग कर रही है।
18 फीसदी ब्याज के साथ मुआवजे की थी मांग
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए मांग की गई थी कि उनकी अधिग्रहीत भूमि का 18 फीसदी ब्याज के साथ उचित मुआवजा तय कर भुगतान किया जाए। साथ ही 19 जनवरी 2024 को दिए गए प्रत्यावेदन पर त्वरित निर्णय लेने का अनुरोध किया गया था।
राज्य सरकार का पक्ष और हाईकोर्ट का निर्णय
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने पक्ष रखा कि भू-स्वामियों की ऐसी शिकायतों के निस्तारण के लिए 12 मई 2016 को एक शासनादेश जारी किया गया है, जिसके तहत भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के आधार पर पर्याप्त मुआवजा तय करने के लिए जिला स्तरीय समिति का प्रावधान है।
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इसके बाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत किसी भी व्यक्ति को कानून के अनुसार उचित मुआवजा दिए बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए किसानों को दो सप्ताह के भीतर जिला स्तरीय समिति के समक्ष नया प्रत्यावेदन देने की छूट दी और समिति को निर्देश दिया कि प्रत्यावेदन मिलने के बाद 12 सप्ताह के भीतर इस पूरी प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाए।
लंबी लड़ाई के बाद न्याय की उम्मीद : किसान
मामले के मुख्य याचिकाकर्ता कृष्णवीर सिंह ने कहा कि गेल वर्ष 2009 से बिना मुआवजा तय किए किसानों की कीमती जमीन का इस्तेमाल कर रही है। अब हाईकोर्ट के आदेश से किसानों को न्याय की उम्मीद जगी है और वे जल्द ही जिला स्तरीय समिति के सामने अपना पक्ष रखेंगे। वहीं, किसान तनुज त्यागी ने कहा कि लंबे समय से उचित मुआवजे और 18 फीसदी ब्याज की मांग को लेकर किसान संघर्ष कर रहे हैं। प्रशासन को चाहिए कि तय 12 सप्ताह की समय सीमा में किसानों के हक में पारदर्शी और उचित मुआवजा राशि निर्धारित करे।
18 फीसदी ब्याज के साथ मुआवजे की थी मांग
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए मांग की गई थी कि उनकी अधिग्रहीत भूमि का 18 फीसदी ब्याज के साथ उचित मुआवजा तय कर भुगतान किया जाए। साथ ही 19 जनवरी 2024 को दिए गए प्रत्यावेदन पर त्वरित निर्णय लेने का अनुरोध किया गया था।
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राज्य सरकार का पक्ष और हाईकोर्ट का निर्णय
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने पक्ष रखा कि भू-स्वामियों की ऐसी शिकायतों के निस्तारण के लिए 12 मई 2016 को एक शासनादेश जारी किया गया है, जिसके तहत भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के आधार पर पर्याप्त मुआवजा तय करने के लिए जिला स्तरीय समिति का प्रावधान है।
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इसके बाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत किसी भी व्यक्ति को कानून के अनुसार उचित मुआवजा दिए बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए किसानों को दो सप्ताह के भीतर जिला स्तरीय समिति के समक्ष नया प्रत्यावेदन देने की छूट दी और समिति को निर्देश दिया कि प्रत्यावेदन मिलने के बाद 12 सप्ताह के भीतर इस पूरी प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाए।
लंबी लड़ाई के बाद न्याय की उम्मीद : किसान
मामले के मुख्य याचिकाकर्ता कृष्णवीर सिंह ने कहा कि गेल वर्ष 2009 से बिना मुआवजा तय किए किसानों की कीमती जमीन का इस्तेमाल कर रही है। अब हाईकोर्ट के आदेश से किसानों को न्याय की उम्मीद जगी है और वे जल्द ही जिला स्तरीय समिति के सामने अपना पक्ष रखेंगे। वहीं, किसान तनुज त्यागी ने कहा कि लंबे समय से उचित मुआवजे और 18 फीसदी ब्याज की मांग को लेकर किसान संघर्ष कर रहे हैं। प्रशासन को चाहिए कि तय 12 सप्ताह की समय सीमा में किसानों के हक में पारदर्शी और उचित मुआवजा राशि निर्धारित करे।