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सरकार ने किसानों के साथ किया धोखा : राकेश टिकैत
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सरकार ने किसानों के साथ किया धोखा : राकेश टिकैत
साहिबाबाद। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि भारत सरकार ने बुधवार को सीजन 2022-23 की खरीद के लिए जो न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है, वह किसानों के साथ मजाक है। सरकार ने किसानों के साथ धोखा किया है।
राकेश टिकैत ने कहा कि कृषि मूल्य आयोग द्वारा पिछले साल गेहूं की पैदावार की लागत 1459 रुपये बताई गई थी, इस साल लागत घटाकर 1080 रुपये कर दी गई है। इससे बड़ा मजाक कुछ हो नहीं सकता। जबकि इस वर्ष महंगाई दर में छह प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जिस तरह से पिछले वर्ष समर्थन मूल्य में इजाफा किया गया था, अगर उस फार्मूले को भी लागू किया जाए तो किसानों को 71 रुपये कम दिए गए हैं। जो सरकार एमएसपी को बड़ा कदम बता रही है उसने किसानों की जेब को काटने का काम किया है। उन्होंने कहा कि दूसरी कुछ फसलों में थोड़े बहुत वृद्धि की गई है, लेकिन उन फसलों की खरीद न होने के कारण किसानों का माल बाजार में सस्ते मूल्य पर लूटा जा रहा है। सरकार को किसानों को यह भी बताना चाहिए कि पंतनगर विश्वविद्यालय, लुधियाना विश्वविद्यालय और जो दूसरे गेहूं उत्पादन करने वाले अनुसंधान केंद्र हैं, उनकी क्या लागत आती है। उन्होंने बताया कि किसानों के साथ सरकारों द्वारा हमेशा अन्याय किया जाता रहा है। वर्ष 1967 में 2.5 कुंतल गेहूं बेचकर एक तोला सोना खरीदा जा सकता था। आज अगर किसान को एक तोले सोने की खरीद करनी हो तो 25 कुंटल गेहूं बेचने की आवश्यकता है। किसानों के साथ किसी भी सरकार ने आर्थिक न्याय नहीं किया है। इसी कारण आज देश का किसान ऊर्जावान ना होकर कर्जदार बन गया है। सरकार को किसानों को ऊर्जावान बनाना है तो उन्हें उनकी फसलों की कीमत देनी ही होगी।
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साहिबाबाद। भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि भारत सरकार ने बुधवार को सीजन 2022-23 की खरीद के लिए जो न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है, वह किसानों के साथ मजाक है। सरकार ने किसानों के साथ धोखा किया है।
राकेश टिकैत ने कहा कि कृषि मूल्य आयोग द्वारा पिछले साल गेहूं की पैदावार की लागत 1459 रुपये बताई गई थी, इस साल लागत घटाकर 1080 रुपये कर दी गई है। इससे बड़ा मजाक कुछ हो नहीं सकता। जबकि इस वर्ष महंगाई दर में छह प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जिस तरह से पिछले वर्ष समर्थन मूल्य में इजाफा किया गया था, अगर उस फार्मूले को भी लागू किया जाए तो किसानों को 71 रुपये कम दिए गए हैं। जो सरकार एमएसपी को बड़ा कदम बता रही है उसने किसानों की जेब को काटने का काम किया है। उन्होंने कहा कि दूसरी कुछ फसलों में थोड़े बहुत वृद्धि की गई है, लेकिन उन फसलों की खरीद न होने के कारण किसानों का माल बाजार में सस्ते मूल्य पर लूटा जा रहा है। सरकार को किसानों को यह भी बताना चाहिए कि पंतनगर विश्वविद्यालय, लुधियाना विश्वविद्यालय और जो दूसरे गेहूं उत्पादन करने वाले अनुसंधान केंद्र हैं, उनकी क्या लागत आती है। उन्होंने बताया कि किसानों के साथ सरकारों द्वारा हमेशा अन्याय किया जाता रहा है। वर्ष 1967 में 2.5 कुंतल गेहूं बेचकर एक तोला सोना खरीदा जा सकता था। आज अगर किसान को एक तोले सोने की खरीद करनी हो तो 25 कुंटल गेहूं बेचने की आवश्यकता है। किसानों के साथ किसी भी सरकार ने आर्थिक न्याय नहीं किया है। इसी कारण आज देश का किसान ऊर्जावान ना होकर कर्जदार बन गया है। सरकार को किसानों को ऊर्जावान बनाना है तो उन्हें उनकी फसलों की कीमत देनी ही होगी।
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