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पैदल पलायन के बाद फिर पटरी पर आए जिंदगी
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पैदल पलायन के बाद फिर पटरी पर आए जिंदगी
शोभित शर्मा
गाजियाबाद। लॉकडाउन में आर्थिक पहिया थम सा गया था। नौकरी, मजदूरी, व्यवसाय सब बंद हो गए। मजदूर पलायन को मजबूर हो गए। सरकार और लोगों ने अपने-अपने स्तर पर मदद भी कि लेकिन लोग हालात काबू से बाहर हो रहे थे। धीरे-धीरे परिस्थिति बदली और रोजी का पहिया पटरी पर आया। अमर उजाला ने कुछ कामगारों से इस पर बात की।
पैदल ही लौट गए घर
प्रतापगढ़ निवासी रोहित ने बताया कि वह अमृत स्टील कंपाउंड औद्योगिक क्षेत्र में बतौर श्रमिक कार्य करते हैं। करीब चार साल की नौकरी के बाद वह अपने परिवार को लेकर गाजियाबाद आए, लेकिन लॉकडाउन में काम बंद होने से मुश्किलों ने परिवार को घेर लिया। पैदल ही घर की ओर पलायन करना पड़ा। उम्मीदें खत्म हो गई थी। कुछ महीने बाद हालात बदले और फैक्टरी से बुलावा आया। दिसंबर में वह वापस काम पर लौट आए।
मुश्किल से परिवार को संभाला
गोरखपुर निवासी अमन ने बताया कि वह लालकुआं के नजदीक एक फैक्टरी में काम करते हैं। लॉकडाउन में वह घर चले गए थे। अमन ने बताया कि लॉकडाउन के 15 दिन बाद ही मुश्किलें सामने आ खड़ी हुईं। राशन खत्म होने लगा और घर जाने के भी पैसे नहीं थे। फैक्टरी मालिक ने मदद की। सोचा था वापस नहीं लौटना है, लेकिन रोजगार भी करना था। वापस गाजियाबाद लौटा। नौकरी वापस मिल गई।
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दोबारा वापसी नई जिंदगी जैसी
कानपुर देहात के पुरी निवासी अनवर ने बताया कि वह नॉन फेबरिक वूबन की फैक्टरी में सिलाई का काम करते हैं। काम बंद होने पर परिवार मुश्किल में आ गया। घर लौटने का इरादा कर लिया था। राशन से लेकर घर के जरूरी सामान जुटाना भी मुश्किल हो रहा था। इस बीच फैक्टरी के शुरू होने की खबर मिली। फैक्टरी में मास्क बनाने का काम शुरू हुआ था। काम का बुलावा आया तो लगा जिंदगी जैसे नई शुरुआत लेकर आई है। इस बीच काम पर गया और परिवार को वापस घर भेज दिया। अब परिवार को भी वापस बुला लिया है।
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शोभित शर्मा
गाजियाबाद। लॉकडाउन में आर्थिक पहिया थम सा गया था। नौकरी, मजदूरी, व्यवसाय सब बंद हो गए। मजदूर पलायन को मजबूर हो गए। सरकार और लोगों ने अपने-अपने स्तर पर मदद भी कि लेकिन लोग हालात काबू से बाहर हो रहे थे। धीरे-धीरे परिस्थिति बदली और रोजी का पहिया पटरी पर आया। अमर उजाला ने कुछ कामगारों से इस पर बात की।
पैदल ही लौट गए घर
प्रतापगढ़ निवासी रोहित ने बताया कि वह अमृत स्टील कंपाउंड औद्योगिक क्षेत्र में बतौर श्रमिक कार्य करते हैं। करीब चार साल की नौकरी के बाद वह अपने परिवार को लेकर गाजियाबाद आए, लेकिन लॉकडाउन में काम बंद होने से मुश्किलों ने परिवार को घेर लिया। पैदल ही घर की ओर पलायन करना पड़ा। उम्मीदें खत्म हो गई थी। कुछ महीने बाद हालात बदले और फैक्टरी से बुलावा आया। दिसंबर में वह वापस काम पर लौट आए।
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मुश्किल से परिवार को संभाला
गोरखपुर निवासी अमन ने बताया कि वह लालकुआं के नजदीक एक फैक्टरी में काम करते हैं। लॉकडाउन में वह घर चले गए थे। अमन ने बताया कि लॉकडाउन के 15 दिन बाद ही मुश्किलें सामने आ खड़ी हुईं। राशन खत्म होने लगा और घर जाने के भी पैसे नहीं थे। फैक्टरी मालिक ने मदद की। सोचा था वापस नहीं लौटना है, लेकिन रोजगार भी करना था। वापस गाजियाबाद लौटा। नौकरी वापस मिल गई।
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दोबारा वापसी नई जिंदगी जैसी
कानपुर देहात के पुरी निवासी अनवर ने बताया कि वह नॉन फेबरिक वूबन की फैक्टरी में सिलाई का काम करते हैं। काम बंद होने पर परिवार मुश्किल में आ गया। घर लौटने का इरादा कर लिया था। राशन से लेकर घर के जरूरी सामान जुटाना भी मुश्किल हो रहा था। इस बीच फैक्टरी के शुरू होने की खबर मिली। फैक्टरी में मास्क बनाने का काम शुरू हुआ था। काम का बुलावा आया तो लगा जिंदगी जैसे नई शुरुआत लेकर आई है। इस बीच काम पर गया और परिवार को वापस घर भेज दिया। अब परिवार को भी वापस बुला लिया है।