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थम गया चुनावी शोर, अब फैसले की बारी
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
Updated Fri, 10 Feb 2017 01:14 AM IST
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चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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ताबड़तोड़ जनसभाओं और धुआंधार प्रचार के बाद बृहस्पतिवार शाम पांच बजे चुनावी शोर थम गया। अब जनता के फैसले की बारी है। पांच विधानसभा सीटों पर 53 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। 11 फरवरी को अब मतदाता इन प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे।
बृहस्पतिवार शाम पांच बजे थमने के बाद जनसभा करने, लाउड स्पीकर से प्रचार करने, रोड शो करने पर प्रतिबंध लग गया। हालांकि प्रत्याशियों को घर-घर जाकर जनसंपर्क की अनुमति होगी। इस बार पहले चरण में मतदान होने की वजह से गाजियाबाद में प्रत्याशियों को प्रचार के लिए समय कम मिला है।
24 फरवरी तक नामांकन होने के बाद 27 फरवरी को नाम वापसी हुए। अधिकांश प्रत्याशियों ने 27 फरवरी के बाद ही प्रचार शुरू किया। ऐसे में प्रचार के अंतिम दिन बृहस्पतिवार को प्रत्याशियों ने पूरी ताकत झोंक दी। सभी विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशियों और नेताओं ने तूफानी दौरा किया। जनसंपर्क कर उन्होंने मतदाताओं से वोट की अपील की।
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सभाएं खत्म अब रूठों को मनाएंगे उम्मीदवार
चुनावी सभाएं खत्म होने के बाद अब कई प्रत्याशी ऐसे पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क साध रहे हैं जो संगठन या उनसे रूठे हैं। उनके शिकवे-गिले दूर कर प्रत्याशी वोटरों को एकजुट करना चाहते हैं। वहीं, कई राजनीतिक दलों ने रूठों को मनाने की जिम्मेदारी स्थानीय पदाधिकारियों को दी है।
उनका मानना है कि नाराजगी बाद में भी जाहिर की जा सकती है, लेकिन मतदान पर इसका असर पड़ा तो उनके नेता विधायक और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाएंगे।
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बृहस्पतिवार शाम पांच बजे थमने के बाद जनसभा करने, लाउड स्पीकर से प्रचार करने, रोड शो करने पर प्रतिबंध लग गया। हालांकि प्रत्याशियों को घर-घर जाकर जनसंपर्क की अनुमति होगी। इस बार पहले चरण में मतदान होने की वजह से गाजियाबाद में प्रत्याशियों को प्रचार के लिए समय कम मिला है।
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24 फरवरी तक नामांकन होने के बाद 27 फरवरी को नाम वापसी हुए। अधिकांश प्रत्याशियों ने 27 फरवरी के बाद ही प्रचार शुरू किया। ऐसे में प्रचार के अंतिम दिन बृहस्पतिवार को प्रत्याशियों ने पूरी ताकत झोंक दी। सभी विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशियों और नेताओं ने तूफानी दौरा किया। जनसंपर्क कर उन्होंने मतदाताओं से वोट की अपील की।
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सभाएं खत्म अब रूठों को मनाएंगे उम्मीदवार
चुनावी सभाएं खत्म होने के बाद अब कई प्रत्याशी ऐसे पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क साध रहे हैं जो संगठन या उनसे रूठे हैं। उनके शिकवे-गिले दूर कर प्रत्याशी वोटरों को एकजुट करना चाहते हैं। वहीं, कई राजनीतिक दलों ने रूठों को मनाने की जिम्मेदारी स्थानीय पदाधिकारियों को दी है।
उनका मानना है कि नाराजगी बाद में भी जाहिर की जा सकती है, लेकिन मतदान पर इसका असर पड़ा तो उनके नेता विधायक और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाएंगे।