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Ghaziabad News: आपसी सहमति से डेढ़ से दो साल में हो रहे तलाक
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गाजियाबाद। पति-पत्नी में आपसी सामंजस्य नहीं बनने से आपसी सहमति से तलाक ले रहे हैं। एक साल में 60 से 70 दंपति अदालत में आपसी सहमति से तलाक ले रहे हैं, जबकि अलग-अलग परिवार न्यायालय में पांच हजार से अधिक मामले आपसी सहमति के विचाराधीन हैं। जबकि अलग-अलग प्रकृति के परिवार न्यायालय में 12500 केस चल रहे हैं। इनमें साठ फीसदी पत्नी की तरफ से अर्जी लगाई गई है।
जिला शासकीय अधिवक्ता राजेश चंद्र शर्मा का कहना है कि आपसी सहमति से तलाक पर फैसला देने के लिए अदालत द्वारा लिया जाने वाला सामान्य समय 18-24 महीने है। इसके अलावा, आपसी सहमति से तलाक छह महीने के भीतर प्राप्त किया जा सकता है, यह पूरी तरह से मामले और अदालत की प्रकृति पर निर्भर करता है। आपसी सहमति से तलाक के लिए कोई विशेष आधार नहीं है।
सहमति नहीं होने पर 12 से 15 साल
अधिवक्ता सिंधु झा का कहना है कि तलाक के केस में अगर एक पक्ष तलाक नहीं चाहता है तो अदालत में 12 से 15 साल भी लग जाते हैं, क्योंकि जो पक्ष तलाक नहीं चाहता है वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से लंबी तारीख लेना चाहता है। अधिवक्ता भी दस्तावेज उपलब्ध कराने या साक्ष्य मांगने के नाम पर कई महीने तक केस को लंबित रखते हैं।
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कई केसों में महिलाएं प्रतिकर नहीं सिर्फ तलाक चाहती हैं
परिवार न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश एससी त्रिपाठी का कहना है कि पहले पति से प्रताड़ित होकर पत्नियां तलाक की अर्जी लगातीं थीं, लेकिन अब साठ फीसदी पति अपनी पत्नी से प्रताड़ित होकर तलाक की अर्जी लगा रहे हैं। बड़ी कंपनियों में उच्च वेतनमान पर काम करने वाली महिलाएं अब सास-ससुर और ससुराल के किसी भी संबंधित से रिश्ता नहीं रखना चाहती हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं ऐसी हैं जो हर तरीके की आजादी चाहती हैं। यह घर में आने-जाने या किसी भी तरह का हस्तक्षेप पसंद नहीं करती हैं। उन्होंने बताया कि गाजियाबाद के कार्यकाल में कई ऐसे मामलों का निस्तारण किया था, जिसमें पत्नी सिर्फ पति से छुटकारा चाहती है, वह तलाक के बदले कोई धनराशि भी नहीं लेना चाहती है। कई मामलों में महिलाएं सिर्फ ससुराल के बंधन से मुक्त होना चाहती हैं।
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जिला शासकीय अधिवक्ता राजेश चंद्र शर्मा का कहना है कि आपसी सहमति से तलाक पर फैसला देने के लिए अदालत द्वारा लिया जाने वाला सामान्य समय 18-24 महीने है। इसके अलावा, आपसी सहमति से तलाक छह महीने के भीतर प्राप्त किया जा सकता है, यह पूरी तरह से मामले और अदालत की प्रकृति पर निर्भर करता है। आपसी सहमति से तलाक के लिए कोई विशेष आधार नहीं है।
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सहमति नहीं होने पर 12 से 15 साल
अधिवक्ता सिंधु झा का कहना है कि तलाक के केस में अगर एक पक्ष तलाक नहीं चाहता है तो अदालत में 12 से 15 साल भी लग जाते हैं, क्योंकि जो पक्ष तलाक नहीं चाहता है वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से लंबी तारीख लेना चाहता है। अधिवक्ता भी दस्तावेज उपलब्ध कराने या साक्ष्य मांगने के नाम पर कई महीने तक केस को लंबित रखते हैं।
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कई केसों में महिलाएं प्रतिकर नहीं सिर्फ तलाक चाहती हैं
परिवार न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश एससी त्रिपाठी का कहना है कि पहले पति से प्रताड़ित होकर पत्नियां तलाक की अर्जी लगातीं थीं, लेकिन अब साठ फीसदी पति अपनी पत्नी से प्रताड़ित होकर तलाक की अर्जी लगा रहे हैं। बड़ी कंपनियों में उच्च वेतनमान पर काम करने वाली महिलाएं अब सास-ससुर और ससुराल के किसी भी संबंधित से रिश्ता नहीं रखना चाहती हैं। इनमें अधिकांश महिलाएं ऐसी हैं जो हर तरीके की आजादी चाहती हैं। यह घर में आने-जाने या किसी भी तरह का हस्तक्षेप पसंद नहीं करती हैं। उन्होंने बताया कि गाजियाबाद के कार्यकाल में कई ऐसे मामलों का निस्तारण किया था, जिसमें पत्नी सिर्फ पति से छुटकारा चाहती है, वह तलाक के बदले कोई धनराशि भी नहीं लेना चाहती है। कई मामलों में महिलाएं सिर्फ ससुराल के बंधन से मुक्त होना चाहती हैं।
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