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Ghaziabad News: अदालत ने संपत्ति विवाद में विक्रेता को सात लाख रुपये लौटाने का दिया आदेश
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गाजियाबाद। भूखंड का सौदा करने के बाद बैनामा नहीं कराने और खरीदार से लिए गए सात लाख रुपये वापस नहीं करने के मामले में अदालत ने सात लाख रुपये छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया है। अपर सिविल जज प्रवर खंड कोर्ट संख्या 10 ने प्रतिवादी रवि कुमार के खिलाफ वादी नीरज तिवारी के पक्ष में आंशिक रूप से फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यह राशि वाद दायर करने की तारीख से अंतिम भुगतान तक देय होगी और निर्णय की तारीख से एक महीने के भीतर भुगतान करना होगा।
अदालत से मिली जानकारी के अनुसार वादी नीरज कुमार ने करहेड़ा मोहन नगर में प्लॉट खरीदने के लिए 23 जुलाई 2018 को दो लाख रुपये नकद और पांच लाख रुपये का चेक देकर कुल सात लाख रुपये बतौर अग्रिम राशि दी थी। दोनों पक्षों के बीच प्लॉट की कीमत 66 लाख 90 हजार रुपये तय हुई थी। इसके बाद 23 जुलाई 2018 को नोटरी के माध्यम से एक इकरारनामा भी किया गया था, जिसमें पांच नवंबर 2018 को बैनामा करने की तारीख तय थी।
नीरज का आरोप था कि तय तारीख आने पर प्रतिवादी ने प्लॉट पर पहले से बैंक ऋण होने की बात कहकर बैनामा टाल दिया। प्रतिवादी के आश्वासन पर वादी ने प्लॉट की खरीद के लिए दो बार लोन कराया। इसमें उन्हें करीब 60 हजार रुपये खर्च करने पड़े। बाद में कई बार आग्रह और कानूनी नोटिस देने के बावजूद न तो प्लॉट का बैनामा हुआ और न ही सात लाख रुपये वापस किए गए। अदालत में वादी ने बैंक खाते का विवरण, नोटरी इकरारनामा, लोन से संबंधित दस्तावेज और कानूनी नोटिस समेत अन्य साक्ष्य पेश किए।
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सुनवाई के दौरान प्रतिवादी की ओर से इन साक्ष्यों का प्रभावी खंडन नहीं किया जा सका। अदालत ने माना कि वादी ने सात लाख रुपये दिए जाने का तथ्य साबित कर दिया है। हालांकि सुनवाई में अदालत ने लोन में खर्च हुए 60 हजार रुपये और अन्य क्षतिपूर्ति की मांग स्वीकार नहीं की। वादी को अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।
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अदालत से मिली जानकारी के अनुसार वादी नीरज कुमार ने करहेड़ा मोहन नगर में प्लॉट खरीदने के लिए 23 जुलाई 2018 को दो लाख रुपये नकद और पांच लाख रुपये का चेक देकर कुल सात लाख रुपये बतौर अग्रिम राशि दी थी। दोनों पक्षों के बीच प्लॉट की कीमत 66 लाख 90 हजार रुपये तय हुई थी। इसके बाद 23 जुलाई 2018 को नोटरी के माध्यम से एक इकरारनामा भी किया गया था, जिसमें पांच नवंबर 2018 को बैनामा करने की तारीख तय थी।
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नीरज का आरोप था कि तय तारीख आने पर प्रतिवादी ने प्लॉट पर पहले से बैंक ऋण होने की बात कहकर बैनामा टाल दिया। प्रतिवादी के आश्वासन पर वादी ने प्लॉट की खरीद के लिए दो बार लोन कराया। इसमें उन्हें करीब 60 हजार रुपये खर्च करने पड़े। बाद में कई बार आग्रह और कानूनी नोटिस देने के बावजूद न तो प्लॉट का बैनामा हुआ और न ही सात लाख रुपये वापस किए गए। अदालत में वादी ने बैंक खाते का विवरण, नोटरी इकरारनामा, लोन से संबंधित दस्तावेज और कानूनी नोटिस समेत अन्य साक्ष्य पेश किए।
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सुनवाई के दौरान प्रतिवादी की ओर से इन साक्ष्यों का प्रभावी खंडन नहीं किया जा सका। अदालत ने माना कि वादी ने सात लाख रुपये दिए जाने का तथ्य साबित कर दिया है। हालांकि सुनवाई में अदालत ने लोन में खर्च हुए 60 हजार रुपये और अन्य क्षतिपूर्ति की मांग स्वीकार नहीं की। वादी को अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।