फरीदाबाद का श्रवण कुमार: एक ओर गंगाजल, दूसरी ओर मां; बेटे के कंधों पर चलती श्रद्धा, सेवा और संस्कार की कांवड़
कांवड़िया बिक्कू हरिद्वार से अपनी मां को कंधों पर बैठाकर गंगाजल के साथ शिवधाम जा रहा है। यह अनोखी यात्रा मातृभक्ति और सेवा का संदेश दे रही है। विस्तार से पढ़ें पूरी खबर-
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सड़कों पर अब कांवड़ियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी है। इस यात्रा के बीच सोमवार को मेरठ रोड पर नंदग्राम मोड़ के पास लोगों की नजर एक अनोखी कांवड़ पर पड़ी, तो कदम थम गए, गाड़ियां रुकने लगीं और सबकी आंखें उस दृश्य पर टिक गईं। जब एक कांवड़िया अपनी कांवड़ के एक ओर पवित्र गंगाजल लिए था और दूसरी ओर उनकी मां बैठी थीं।
वह मां, जिसने कभी बेटे की उंगली थामकर उसे चलना सिखाया था। आज वही बेटा अपनी मां को कंधों पर उठाकर हरिद्वार से फरीदाबाद के शिवधाम की ओर बढ़ रहा है। कंधों पर कांवड़ थी, लेकिन उसमें केवल गंगाजल नहीं, बल्कि मां के प्रति श्रद्धा, सेवा और संस्कारों का पूरा संसार सवार था। इस भावुक दृश्य को देखकर रास्ते से गुजरने वाले लोगों ने एक ही स्वर में बम-बम भोले का जयघोष किया।
ओल्ड फरीदाबाद की आदर्श कॉलोनी के रहने वाले बिक्कू ने बताया कि वह और उनकी मां 20 जुलाई की रात घर से निकले थे और 22 जुलाई की शाम हरिद्वार से कांवड़ उठाई। इस कांवड़ के एक पलड़े में 35 लीटर पवित्र गंगाजल था, तो दूसरे पलड़े में उनकी 50 वर्षीय मां संतु विराजमान थीं, जिनका वजन लगभग 38 किलो है। मां को कंधों पर बैठाकर गंगाजल के साथ शिवधाम की ओर बढ़ते इस दृश्य ने रास्ते भर लोगों को भावुक कर दिया। जिसने भी यह नजारा देखा, उसने बेटे की श्रद्धा और मातृभक्ति को नमन किया।
बिक्कू ने बताया कि मूल रूप से कोसी, मथुरा के रहने वाले हैं और उनके पिता फूल सिंह का करीब पांच वर्ष पहले निधन हो चुका है। उनकी यह पहली कांवड़ यात्रा है, लेकिन उन्होंने इसे जीवन की सबसे यादगार और प्रेरणादायक यात्रा बना दिया है। इस कठिन यात्रा में उनके मित्र पंकज भी हर कदम पर साथ हैं। पंकज पूरे रास्ते बिक्कू का बैग उठाकर उनका सहयोग कर रहे हैं, ताकि वह बिना किसी परेशानी के मां और गंगाजल के साथ अपनी शिवभक्ति पूरी कर सकें।
मां की सेवा ही असली शिव की भक्ति
फरीदाबाद की निजी कंपनी में ही काम करने वाले बिक्कू का कहना है कि मां की सेवा से बढ़कर कोई पूजा नहीं होती। अगर भगवान शिव की आराधना मां को साथ लेकर की जाए, तो यह भक्ति और भी पवित्र हो जाती है। श्रवण कुमार की कहानी आज भी लोगों के दिलों में बसती है, लेकिन बिक्कू ने अपनी इस अनोखी कांवड़ यात्रा से यह संदेश दिया है कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि मां-बाप की सेवा में भी बसती है। उनकी यह यात्रा श्रद्धा, सेवा और संस्कार का ऐसा उदाहरण बन गई है, जिसकी चर्चा पूरे कांवड़ मार्ग पर हो रही है।