आपदा एप करेगा अलर्ट: एक घंटे पहले देगा चेतावनी, बिना इंटरनेट के भी मिलेगी जानकारी; जानें कैसे करेगा काम
दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने एक आपदा सहायक एप बनाया है। जो हिमालयी क्षेत्र में संभावित आपदा से लगभग एक घंटे पहले लोगों को करेगा। डीयू के हिमालय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. बी.डब्ल्यू. पांडेय ने बताया कि 150 वर्षों के आंकड़ों के अध्ययन के बाद यह एप बनाया गया है।
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आपदा को रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय रहते चेतावनी देकर नुकसान और जनहाानि कम की जा सकती है। दिल्ली विश्वविद्यालय व विभिन्न विवि के प्रोफेसर व शोधार्थियों की ओर से तैयार किया गया आपदा सहायक एप इस दिशा में उम्मीद को जगाता है। यह एप हिमालयी क्षेत्र में संभावित आपदा से लगभग एक घंटे पहले लोगों को सतर्क कर देता है, ताकि वे समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंच सकें। साथ ही यह हर पांच मिनट पर आपदा की स्थिति की अद्यतन जानकारी भी उपलब्ध कराता है। वहीं, एप के मुख्य अन्वेषक कंबरिया विवि के प्रो रिचर्ड जॉनसन हैं। डीयू से एप के संचालन का नेतृत्व प्रो. बी.डब्ल्यू. पांडेय ने किया।
डीयू के हिमालय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. बी.डब्ल्यू. पांडेय ने बताया कि हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं से बचाव के लिए पिछले 150 वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इन आंकड़ों को जुटाने का स्रोत नेहरू मेमोरियल, दिल्ली और लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी रही। संग्रहीत आंकड़ों का तीन माह तक विश्लेषण किया गया। इस शोध कार्य को जिनेवा की प्रतिष्ठित जर्नल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन में प्रकाशित किया गया। शोध को मानव कल्याण के लिए उपयोगी बनाने के उद्देश्य से व्यापक मंथन किया गया।
इसके बाद इस एप को विकसित करने का विचार आया। इस शोध परियोजना का नाम हाईफ्लो डाटा रखा गया। भारत सरकार गृह मंत्रालय के अधीन एनडीएमसी, एसडीएमसी की निगरानी में इस परियोजना पर वर्ष 2018 से कार्य शुरू किया गया। उन्होंने बताया कि इस परियोजना को ब्रिटिश काउंसिल के सहयोग से विकसित किया गया। इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के अलावा जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान , यूनिवर्सिटी ऑफ कंबरिया (यूके) व यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लॉस्टरशायर (यूके) का भी सहयोग रहा।
एप कैसे करता है काम
प्रो. पांडेय ने बताया कि एप में उन सभी स्थानों का डाटा संकलित किया गया है, जहां पिछले 150 वर्षों में भूकंप, बादल फटना, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी घटनाएं अधिक हुई हैं। यह एप गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड कर एंड्रॉयड मोबाइल फोन में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें उपयोगकर्ताओं के लिए सरल दिशा-निर्देश भी दिए गए हैं। अभी एप्पल के मोबाइल फोन के लिए काम चल रहा है।
2026 में हुई शुरुआत
प्रो. पांडेय ने बताया कि एप पर वर्ष 2018 से कार्य चल रहा था। वर्ष 2026 में सफल परीक्षण के बाद इसे आम लोगों के लिए शुरू किया गया। प्ले स्टोर से लोग इसे डाउनलोड कर सकते हैं। इसका क्यूआर कोड भी बनाया गया है। उन्होंने बताया कि विभिन्न कार्यशालाओं और गोष्ठियों के माध्यम से लोगों को एप की जानकारी दी जा रही है, ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें।
कंबरिया विश्वविद्यालय (यूके) के प्रो. रिचर्ड जॉनसन ने बताया कि इस आपदा सहायक एप के माध्यम से लोगों को समय रहते आपदा की सूचना मिल सकेगी, जिससे वे सुरक्षित स्थान पर पहुंचकर अपनी जान बचा सकेंगे। कंबरिया विवि के प्रो. आएन कनवरी ने बताया कि यह एप अमेजन मॅाडल पर कार्य करता है। विश्व में इसकी मानकता है। इस मॅाडल का इस्तेमाल राॅकेट साइंस में किया जाता है। उन्होंने बताया कि सेंसर, सेटालाइट और इंटरनेट तीनों माध्यम से यह एप कार्य करता है।
बिना इंटरनेट के भी मिलेगी जानकारी
शोधार्थी राम मनोहर ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में इस एप को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया था। परीक्षण के दौरान एप ने संभावित आपदा के संकेत लगभग एक घंटे पहले दे दिए और अंतिम पांच मिनट तक लगातार स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराता रहा।
उन्होंने बताया कि एप के माध्यम से लोग स्वयं भी किसी संभावित आपदा स्थल की जानकारी साझा कर सकते हैं। इसके लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा की गई सूचना अन्य लोगों के साथ-साथ सरकार तक भी तुरंत पहुंच सकेगी।
उन्होंने बताया कि यह एप पूरी तरह निशुल्क है। इसमें पिछले कई वर्षों में आई आपदाओं से संबंधित स्थानों का डेटा भी उपलब्ध है। इंटरनेट न होने पर भी उपयोगकर्ता संग्रहीत जानकारी देख सकते हैं, जबकि रियल-टाइम अलर्ट प्राप्त करने के लिए इंटरनेट आवश्यक होगा। भविष्य में बिना इंटरनेट के भी रियल-टाइम सूचना उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।