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फरीदाबाद की सीटों पर किसान नेता ठोकेंगे ताल!
कुंदन तिवारी/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Fri, 16 May 2014 07:08 AM IST
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लोकसभा चुनाव खत्म होते-होते विधानसभा का रण शुरू हो गया है। जिसको लेकर नेताओं ने अपने-अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। यहां पर तीन विधानसभा क्षेत्रों में चार किसानों ने इस बार चुनाव लड़ने की अपनी दावेदारी की है।
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जिले की छह में से तीन विधानसभा ऐसी हैं, जिसमें किसानों की जबरदस्त पकड़ है। भूमि अधिग्रहण मसले पर असंतोष एवं किसान आंदोलनों ने पिछले पांच-सात साल में यहां कई किसान नेता पैदा किए हैं। भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य मूलचंद शर्मा बल्लभगढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ना चाहते हैं। लंबे समय से वह इसकी तैयारी में जुटे हैं।
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शर्मा वर्ष 2005 में इनेलो की टिकट पर बल्लभगढ़ से विधानसभा चुनाव लड़े थे। कांग्रेस की आंधी में भी वे 34212 वोट लेकर दूसरे नंबर पर रहे। इस बार भाजपा से टिकट की दावेदारी है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रामविलास शर्मा रिश्ते में उनके समधी हैं। इसलिए इस सीट पर उनका दावा मजबूत माना जा रहा है।
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वहीं इसी सीट पर कांग्रेस के पुराने नेता एवं प्रगतिशील किसान क्लब के अध्यक्ष सतवीर डागर कांग्रेस से टिकट चाहते हैं। उन्होंने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर में 440 एकड़ जमीन देने वाले 19 गांव के किसानों का नेतृत्व कर नए सर्कल रेट के हिसाब मुआवजा दिलाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। इस समय वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं।
अपने प्रदर्शनों से फरीदाबाद विधानसभा में किसान नेता के रूप में एडवोकेट शिवदत्त वशिष्ठ ने पहचान बनाई है। मौजूदा समय में वशिष्ठ भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने इस सीट पर दावेदारी जताई है। उनकी जमीन प्रदेश सरकार ने ग्रेटर फरीदाबाद में सेक्टर-75 व 80 को बसाने के लिए अधिग्रहित की है। लेकिन पिछले कई वर्ष में हुडा की ओर से इस जमीन पर कब्जा तक नहीं लिया जा सका है।
इंडियन ऑयल में किसान परिवारों को नौकरी दिलाने एवं इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप में किसानों को रिहायशी प्लाट दिलाने की मांग को लेकर पृथला विधानसभा में भी किसान नेता पैदा हुए हैं। भाजपा किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष नयन पाल रावत यहां से किसान नेता के रूप में टिकट की दावेदारी जता रहे हैं।
प्रदेश सरकार या हुडा की ओर से जमीन अधिग्रहण के पहले अगर किसानों से उनकी राय ली गई होती तो शायद ये किसान नेता नहीं पैदा होते। प्रदेश सरकार की कुछ नीतियों के कारण रह रह कर किसानों के बीच असंतोष बढ़ता रहा और यह लोग किसानों को नेतृत्व करते रहे।