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केजरीवाल की चिट्ठी बनी केंद्र सरकार के लिए नया सिरदर्द

Thu, 05 Mar 2015 12:26 AM IST
Updated Thu, 05 Mar 2015 12:26 AM IST
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Fight between delhi and central government

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार और नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार के बीच लड़ाई जारी रहेगी।

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मुख्य सचिव के तौर दूसरे ऑप्शन कै तौर पर गोवा के मुख्य सचिव केके शर्मा को दिल्ली केलिए लेने में कामयाब अरविंद केजरीवाल की लड़ाई अब एम्स केपूर्व सीवीओ संजीव चतुर्वेदी पर आगे बढ़ी है।

मुख्यमंत्री के सचिव राजेन्द्र कुमार ने मामले में मुख्यमंत्री के पत्र का हवाला देकर 15 दिन बाद भी कोई जवाब नहीं मिलने पर आपत्ति दर्ज कराई है।

राजेन्द्र कुमार ने केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन के सचिव अशोक लवासा को लिखे गए पत्र में कहा है कि आईएफएस, एचआर-2002 को ओएसडी बनाए जाने के लिए एक पत्र भेजा था। अभी तक उस पर कोई जवाब नहीं मिला है।
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स्वीकृति के बाद भी देरी क्यों?

Fight between delhi and central government
पत्र में मुख्यमंत्री के सचिव ने लिखा है कि हरियाणा सरकार कैडर क्लीयरेंस और जून, 2016 तक डेपुटेशन की स्वीकृति पहले ही दे चुकी है।

इतना ही नहीं अधिकारी अभी एम्स में उपसचिव के तौर पर तैनात हैं जबकि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जून, 2014 में ही इन्हें वापस अपनी सेवा में भेजे जाने की बात कह चुके हैं।

पत्र के अंत में मुख्यमंत्री के सचिव ने कहा है कि कृपया स्वयं मामले को देखें और जितनी जल्दी हो सके इन्हें दिल्ली सरकार में भेजने केलिए कार्यमुक्त करें।

उल्लेखनीय है कि अरविंद केजरीवाल गत रविवार को सार्वजनिक सभा में कह चुके हैं कि जब संजीव चतुर्वेदी से स्वास्थ्य मंत्रालय कोई काम नहीं ले रहा है तो फिर हमें देने में दिक्कत क्या है?

लेटलतीफी पर भी उठाए गए हैं सवाल

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केजरीवाल ने यह पत्र 16 फरवरी, 2015 को लिखा था। पन्द्रह दिन बाद भी कोई जवाब नहीं मिला जबकि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 24 जून, 2014 में चौबीस घंटे के दौरान हटाए जाने केलिए चौबीस घंटे में 20 नेता और अधिकारी की टेबल से फाइल साइन होकर आ गई थी।

दिल्ली सरकार से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यूपी कैडर की आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल को हाल ही में केन्द्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन का ओएसडी बनाया गया है।

उस आदेश में लिखा है कि 5 गृह कैडर में 5 साल बिताने के नियम में छूट दी जाती है। इसके अलावा कुछ और उदाहरण भी हैं। तो फिर संजीव चतुर्वेदी मामले में देरी क्यों?

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