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Faridabad News: बैठे-बैठे 8 बजे से 11 हो गए, अब तक काम नहीं मिला
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गैस किल्लत के बीच काम नहीं मिलने से श्रमिक पलायन को मजबूर
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। बैठे-बैठे 8 बजे से 11 हो गए, पर अब तक काम नहीं मिला। पिछले एक महीने से यही हाल है। ऊपर से 300 रुपये किलो गैस है। रोजी मिलेगी तभी रोटी नसीब होगी न। ऐसी स्थिति ज्यादा दिन रही तो मुझे गांव वापस लौटना पड़ेगा। यह दर्द झांसी से औद्योगिक नगरी में काम करने आए चंद्रराम ने बयां किया। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण औद्योगिक नगरी में निर्माण कार्य की रफ्तार धीमी पड़ गई है। साथ ही गैस किल्लत की दोहरी मार ने दिहाड़ी मजदूरों की कमर तोड़ दी है। शहर के कई लेबर चौक पर काम की तलाश में आए मजदूरों के चेहरे पर चिंता की लकीरें दिख रही हैं। श्रमिकों का कहना है कि काम नहीं मिलने पर उन्हें जल्द शहर छोड़ना पड़ सकता है।
एनआईटी, ओल्ड फरीदाबाद, सेक्टर 14-15 और बल्लभगढ़ के लेबर चौक पर स्थिति चिंताजनक है। मजदूरों ने बताया कि निर्माण कार्यों में सुस्ती के कारण महीने में 15 से 18 दिन ही काम मिल रहा है। वहीं दूसरी तरफ रसोई गैस (एलपीजी) की कालाबाजारी ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। उनका कहना है कि कालाबाजारी के कारण उन्हें 300 से 400 रुपये प्रति किलो गैस खरीदनी पड़ रही है। छोटा सिलेंडर भरवाना अब उनके एक दिन की पूरी दिहाड़ी के बराबर हो गया है।
इसी कारण से उसके कुछ साथी अपने-अपने गांव लौट चुके हैं। आगे यही स्थिति रही तो उन्हें भी गांव जाना पड़ेगा। बता दें कि शहर में यूपी के झांसी, सीतापुर, कानपुर और बरेली समेत कई जगहों से लोग काम करने आते हैं। इसके अलावा बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए औद्योगिक नगरी का रुख करते हैं।
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बैठे-बैठे 8 बजे से 11 हो गए, पर अब तक काम नहीं मिला है। यही आलम पिछले करीब एक महीने से है। ऊपर से 300 रुपये किलो गैस है। शहर छोड़ने के अलावा काई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।-चन्द्रराम, दिहाड़ी मजदूर, झांसी
काम रोजाना मिल नहीं रहा है और गैस के दाम आसमान छू रहे हैं। क्या खाएं और क्या बचाएं समझ नहीं आ रहा है। - विनोद, दिहाड़ी मजदूर, बिहार
सिर्फ गैस ही नहीं और भी चीजें महंगी हो रही हैं। तेल, रिफाइंड सहित ठेले और ढाबों पर मिलने वाली वस्तुएं भी महंगी हुई हैं। वहीं काम मिलना उतना ही कम हो रहा है। हमारे पास गांव लौटने का रास्ता ही बचा है।- नंदलाल, मिस्त्री, बिहार
एक दिन की दिहाड़ी गैस भरवाने में ही चली जा रही है। कब यह दोबारा सस्ती होगी पता नहीं चल रहा है। महीने में 15 दिन ही काम मिल रहा है। कमाई से ज्यादा खर्च हो रहा है।-अशोक, दिहाड़ी मजदूर, मध्यप्रदेश
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संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। बैठे-बैठे 8 बजे से 11 हो गए, पर अब तक काम नहीं मिला। पिछले एक महीने से यही हाल है। ऊपर से 300 रुपये किलो गैस है। रोजी मिलेगी तभी रोटी नसीब होगी न। ऐसी स्थिति ज्यादा दिन रही तो मुझे गांव वापस लौटना पड़ेगा। यह दर्द झांसी से औद्योगिक नगरी में काम करने आए चंद्रराम ने बयां किया। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण औद्योगिक नगरी में निर्माण कार्य की रफ्तार धीमी पड़ गई है। साथ ही गैस किल्लत की दोहरी मार ने दिहाड़ी मजदूरों की कमर तोड़ दी है। शहर के कई लेबर चौक पर काम की तलाश में आए मजदूरों के चेहरे पर चिंता की लकीरें दिख रही हैं। श्रमिकों का कहना है कि काम नहीं मिलने पर उन्हें जल्द शहर छोड़ना पड़ सकता है।
एनआईटी, ओल्ड फरीदाबाद, सेक्टर 14-15 और बल्लभगढ़ के लेबर चौक पर स्थिति चिंताजनक है। मजदूरों ने बताया कि निर्माण कार्यों में सुस्ती के कारण महीने में 15 से 18 दिन ही काम मिल रहा है। वहीं दूसरी तरफ रसोई गैस (एलपीजी) की कालाबाजारी ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। उनका कहना है कि कालाबाजारी के कारण उन्हें 300 से 400 रुपये प्रति किलो गैस खरीदनी पड़ रही है। छोटा सिलेंडर भरवाना अब उनके एक दिन की पूरी दिहाड़ी के बराबर हो गया है।
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इसी कारण से उसके कुछ साथी अपने-अपने गांव लौट चुके हैं। आगे यही स्थिति रही तो उन्हें भी गांव जाना पड़ेगा। बता दें कि शहर में यूपी के झांसी, सीतापुर, कानपुर और बरेली समेत कई जगहों से लोग काम करने आते हैं। इसके अलावा बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए औद्योगिक नगरी का रुख करते हैं।
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बैठे-बैठे 8 बजे से 11 हो गए, पर अब तक काम नहीं मिला है। यही आलम पिछले करीब एक महीने से है। ऊपर से 300 रुपये किलो गैस है। शहर छोड़ने के अलावा काई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।-चन्द्रराम, दिहाड़ी मजदूर, झांसी
काम रोजाना मिल नहीं रहा है और गैस के दाम आसमान छू रहे हैं। क्या खाएं और क्या बचाएं समझ नहीं आ रहा है। - विनोद, दिहाड़ी मजदूर, बिहार
सिर्फ गैस ही नहीं और भी चीजें महंगी हो रही हैं। तेल, रिफाइंड सहित ठेले और ढाबों पर मिलने वाली वस्तुएं भी महंगी हुई हैं। वहीं काम मिलना उतना ही कम हो रहा है। हमारे पास गांव लौटने का रास्ता ही बचा है।- नंदलाल, मिस्त्री, बिहार
एक दिन की दिहाड़ी गैस भरवाने में ही चली जा रही है। कब यह दोबारा सस्ती होगी पता नहीं चल रहा है। महीने में 15 दिन ही काम मिल रहा है। कमाई से ज्यादा खर्च हो रहा है।-अशोक, दिहाड़ी मजदूर, मध्यप्रदेश