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Faridabad News: दीर्घायु की कामना कर मनाया हरेला पर्व
Wed, 16 Jul 2025 07:16 PM IST
नोएडा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फरीदाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फरीदाबाद
Updated Wed, 16 Jul 2025 07:16 PM IST
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- 10 दिन पहले टोकरी में बोया जाता है सात प्रकार का अनाज
- 10वें दिन बच्चों के सर और कान पर रखा जाता है हरेला
संवाद न्यूज एजेंसी
बल्लभगढ़। सावन के महीने में जहां एक ओर कांवड़ यात्रा का उत्साह देखने को मिलता है। वहीं सावन के महीने में उत्तराखंड का पारंपरिक पर्व हरेला भी मनाया जाता है। फरीदाबाद में यह पर्व बुधवार को मनाया गया। जिले में करीब एक लाख से अधिक उत्तराखंड प्रवासी एनआईटी क्षेत्र में रहते हैं। इस पर्व को मनाने के लिए लोग करीब 10 दिन पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। सुख दुख संघर्ष एवं सहायता टीम की ओर से पर्व को परंपरागत और उत्साह पूर्वक मनाया गया। इस दिन घर के बड़े बुजुर्गों और बच्चों की दीर्घायु की कामना के साथ पूजा अर्चना की गई।
टीम के अध्यक्ष प्रेम बिष्ट ने बताया कि हरेला पर्व उत्तराखंड का प्रमुख पर्व है। हरेला का अर्थ है, हरियाली का दिन और यह भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने के लिए सावन महीने में मनाया जाता है। इस पर्व को हरियाली और समृद्धि से जोड़ते हैं। यह पर्व 10 या 11 दिन तक चलता है।
अंधेरे में बोया जाता है अनाज
उन्होंने बताया कि 10 दिन पहले एक टोकरी में साफ मिट्टी रखकर उसमें सात या पांच प्रकार के अनाज बोया जाता है। उसमें गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, गहत, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के अनाज बोये जाते हैं। कर्क संक्रांति की पूर्व संध्या पर हरेले की गुड़ाई की जाती है। इसकी रोजाना पूजा की जाती है और इसमें जल चढ़ाया जाता है। अंधेरे में रखने की वजह से इसका रंग पीला पड़ जाता है। उसके बाद उगे हुए पौधों को एक साथ बांध दिया जाता है। अगले दिन इसे काटकर पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों को वितरित किया जाता है। साथ परिवार की दीर्घायु की कामना के साथ पूजा अर्चना की जाती है।
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बच्चों की पूजा कर घर के चौखट पर लगाया जाता है हरेला
उन्होंने बताया कि दसवें दिन श्रावण मास की संक्रांति को इसे काटकर सर्वप्रथम क्षेत्रपाल देवता को चढ़ाया जाता है और धरती में कृषि उपज की अच्छी पैदावार की कामना की जाती है। उसके बाद घर के सदस्यों को यह हरेला चढ़ाया जाता है। इस दिन घर के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों, नाती, पोतों को हरेला पूजते हुए उनके सिर और कान में हरेला रखते हैं। साथ ही आशीर्वाद भी देते हैं। उसके बाद हरेला को घर की सुख शांति के लिए मुख्य द्वार पर लगाया जाता है।
सावन मास भगवान शिव का प्रिय मास माना जाता है। हरेला पर्व सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, इसलिए यह पर्व भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। - प्रेम बिष्ट, प्रधान
बच्चों की लंबी आयु के लिए हरेला पर्व मनाया जाता है। जिसकी तैयारी करीब 10 दिन पहले से शुरू कर दी जाती है। - ललित मनशल, उप प्रधान
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- 10वें दिन बच्चों के सर और कान पर रखा जाता है हरेला
संवाद न्यूज एजेंसी
बल्लभगढ़। सावन के महीने में जहां एक ओर कांवड़ यात्रा का उत्साह देखने को मिलता है। वहीं सावन के महीने में उत्तराखंड का पारंपरिक पर्व हरेला भी मनाया जाता है। फरीदाबाद में यह पर्व बुधवार को मनाया गया। जिले में करीब एक लाख से अधिक उत्तराखंड प्रवासी एनआईटी क्षेत्र में रहते हैं। इस पर्व को मनाने के लिए लोग करीब 10 दिन पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। सुख दुख संघर्ष एवं सहायता टीम की ओर से पर्व को परंपरागत और उत्साह पूर्वक मनाया गया। इस दिन घर के बड़े बुजुर्गों और बच्चों की दीर्घायु की कामना के साथ पूजा अर्चना की गई।
टीम के अध्यक्ष प्रेम बिष्ट ने बताया कि हरेला पर्व उत्तराखंड का प्रमुख पर्व है। हरेला का अर्थ है, हरियाली का दिन और यह भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करने के लिए सावन महीने में मनाया जाता है। इस पर्व को हरियाली और समृद्धि से जोड़ते हैं। यह पर्व 10 या 11 दिन तक चलता है।
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अंधेरे में बोया जाता है अनाज
उन्होंने बताया कि 10 दिन पहले एक टोकरी में साफ मिट्टी रखकर उसमें सात या पांच प्रकार के अनाज बोया जाता है। उसमें गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, गहत, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के अनाज बोये जाते हैं। कर्क संक्रांति की पूर्व संध्या पर हरेले की गुड़ाई की जाती है। इसकी रोजाना पूजा की जाती है और इसमें जल चढ़ाया जाता है। अंधेरे में रखने की वजह से इसका रंग पीला पड़ जाता है। उसके बाद उगे हुए पौधों को एक साथ बांध दिया जाता है। अगले दिन इसे काटकर पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों को वितरित किया जाता है। साथ परिवार की दीर्घायु की कामना के साथ पूजा अर्चना की जाती है।
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बच्चों की पूजा कर घर के चौखट पर लगाया जाता है हरेला
उन्होंने बताया कि दसवें दिन श्रावण मास की संक्रांति को इसे काटकर सर्वप्रथम क्षेत्रपाल देवता को चढ़ाया जाता है और धरती में कृषि उपज की अच्छी पैदावार की कामना की जाती है। उसके बाद घर के सदस्यों को यह हरेला चढ़ाया जाता है। इस दिन घर के बड़े बुजुर्ग अपने बच्चों, नाती, पोतों को हरेला पूजते हुए उनके सिर और कान में हरेला रखते हैं। साथ ही आशीर्वाद भी देते हैं। उसके बाद हरेला को घर की सुख शांति के लिए मुख्य द्वार पर लगाया जाता है।
सावन मास भगवान शिव का प्रिय मास माना जाता है। हरेला पर्व सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, इसलिए यह पर्व भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। - प्रेम बिष्ट, प्रधान
बच्चों की लंबी आयु के लिए हरेला पर्व मनाया जाता है। जिसकी तैयारी करीब 10 दिन पहले से शुरू कर दी जाती है। - ललित मनशल, उप प्रधान