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Faridabad News: बिजली चोरी के मामले में एडीजे ने सिविल कोर्ट का फैसला पलटा
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सचिन कुमार
फरीदाबाद। बिजली चोरी से जुड़े मामलों में सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार की अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि जब मामला बिजली चोरी से संबंधित हो और उस पर विद्युत अधिनियम की धारा 135 लागू होती हो, तो ऐसे विवादों की सुनवाई सिविल कोर्ट में नहीं की जा सकती।
मामला दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (डीएचबीवीएनएल) और मोहम्मद उमर के बीच का है। निगम ने 18 अगस्त 2017 को जांच के बाद बिजली चोरी का आरोप लगाया था। इसके आधार पर 19 अगस्त 2017 को एक लाख 11 हजार रुपये का आकलन नोटिस और 25 हजार रुपये की कंपाउंडिंग फीस का नोटिस जारी किया गया। मोहम्मद उमर ने इन नोटिसों को गलत बताते हुए सिविल कोर्ट में चुनौती दी। सिविल जज (जूनियर डिवीजन) ने 31 अक्तूबर 2022 को वादी के पक्ष में फैसला देते हुए नोटिस रद्द कर दिए थे।
19 दिन की देरी माफ, अपील सुनवाई के योग्य मानी गई
इस आदेश के खिलाफ निगम ने अपील दायर की, जिसमें 19 दिन की देरी हुई थी। अपीलीय अदालत ने देरी को यह कहते हुए माफ कर दिया कि मामलों का निपटारा गुण-दोष के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल तकनीकी आधार पर। सुनवाई के दौरान निगम ने दलील दी कि जहां चोरी का आरोप हो और एलएल-1 रिपोर्ट तैयार की गई हो, वहां मामला सीधे विद्युत अधिनियम की धारा 135 के अंतर्गत आता है। ऐसे मामलों के लिए विशेष न्यायालय का प्रावधान है, इसलिए सिविल अदालत को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। निगम ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के हालिया निर्णय महेश कुमार बनाम सब डिविजनल ऑफिसर (14 मई 2025) फैसले का हवाला भी दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि बिजली चोरी के मामलों में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र प्रतिबंधित है।
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बरी होने का तर्क नहीं माना गया
वादी पक्ष ने तर्क दिया कि उन्हें संबंधित आपराधिक मामले में अगस्त 2024 में बरी कर दिया गया, इसलिए आरोप टिकता नहीं है। हालांकि अदालत ने कहा कि सिविल वाद का निर्णय 2022 में हो चुका था और मूल प्रश्न अधिकार क्षेत्र का है। जब सिविल अदालत को सुनवाई का अधिकार ही नहीं था, तो अन्य पहलुओं पर विचार आवश्यक नहीं है। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का निर्णय और डिक्री रद्द कर दी व सिविल वाद को अधिकार क्षेत्र के अभाव में खारिज कर दिया। साथ ही वादी को कानून के अनुसार उचित मंच पर राहत लेने की स्वतंत्रता दी गई है।
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फरीदाबाद। बिजली चोरी से जुड़े मामलों में सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र कुमार की अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि जब मामला बिजली चोरी से संबंधित हो और उस पर विद्युत अधिनियम की धारा 135 लागू होती हो, तो ऐसे विवादों की सुनवाई सिविल कोर्ट में नहीं की जा सकती।
मामला दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (डीएचबीवीएनएल) और मोहम्मद उमर के बीच का है। निगम ने 18 अगस्त 2017 को जांच के बाद बिजली चोरी का आरोप लगाया था। इसके आधार पर 19 अगस्त 2017 को एक लाख 11 हजार रुपये का आकलन नोटिस और 25 हजार रुपये की कंपाउंडिंग फीस का नोटिस जारी किया गया। मोहम्मद उमर ने इन नोटिसों को गलत बताते हुए सिविल कोर्ट में चुनौती दी। सिविल जज (जूनियर डिवीजन) ने 31 अक्तूबर 2022 को वादी के पक्ष में फैसला देते हुए नोटिस रद्द कर दिए थे।
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19 दिन की देरी माफ, अपील सुनवाई के योग्य मानी गई
इस आदेश के खिलाफ निगम ने अपील दायर की, जिसमें 19 दिन की देरी हुई थी। अपीलीय अदालत ने देरी को यह कहते हुए माफ कर दिया कि मामलों का निपटारा गुण-दोष के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल तकनीकी आधार पर। सुनवाई के दौरान निगम ने दलील दी कि जहां चोरी का आरोप हो और एलएल-1 रिपोर्ट तैयार की गई हो, वहां मामला सीधे विद्युत अधिनियम की धारा 135 के अंतर्गत आता है। ऐसे मामलों के लिए विशेष न्यायालय का प्रावधान है, इसलिए सिविल अदालत को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। निगम ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के हालिया निर्णय महेश कुमार बनाम सब डिविजनल ऑफिसर (14 मई 2025) फैसले का हवाला भी दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि बिजली चोरी के मामलों में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र प्रतिबंधित है।
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बरी होने का तर्क नहीं माना गया
वादी पक्ष ने तर्क दिया कि उन्हें संबंधित आपराधिक मामले में अगस्त 2024 में बरी कर दिया गया, इसलिए आरोप टिकता नहीं है। हालांकि अदालत ने कहा कि सिविल वाद का निर्णय 2022 में हो चुका था और मूल प्रश्न अधिकार क्षेत्र का है। जब सिविल अदालत को सुनवाई का अधिकार ही नहीं था, तो अन्य पहलुओं पर विचार आवश्यक नहीं है। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का निर्णय और डिक्री रद्द कर दी व सिविल वाद को अधिकार क्षेत्र के अभाव में खारिज कर दिया। साथ ही वादी को कानून के अनुसार उचित मंच पर राहत लेने की स्वतंत्रता दी गई है।