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50 साल बाद भी आपातकाल के जख्म ताजा: जब बोलना भी था जुर्म, रातों-रात अखबारों की काट दी गई थी बिजली

Sun, 28 Jun 2026 08:05 AM IST
Vijay Singh Pundir ज्योति सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली
ज्योति सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vijay Singh Pundir Updated Sun, 28 Jun 2026 08:05 AM IST
सार

 25 जून 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल लागू हुआ। संविधान के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप तक लगा दी। गई थी। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया।

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Even after 50 years the wounds of the Emergency remain fresh: even speaking out was a crime
आपातकाल के 50 साल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रातों-रात अखबारों की बिजली काट दी गई थी। अगले दिन अखबार का संपादकीय पन्ना खाली था। लोगों के बोलने, लिखने और विरोध करने का अधिकार छीन लिया गया था। 50 साल बाद भी आपातकाल की यादें उन लोगों की आंखों में ताजा हैं, जिन्होंने उसे अपनी आंखों से देखा और भुगता।

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25 जून 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल लागू हुआ। संविधान के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप तक लगा दी गई थी। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। उस दौर के प्रत्यक्षदर्शी आज भी उस समय को भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय मानते हैं। उस दौर की कल्पना भी मुश्किल है। 

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हम गुपचुप पत्रिकाएं बांटते थे : हरेंद्र 
जेपी आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता हरेंद्र बताते हैं कि आपातकाल लगते ही सबसे पहले प्रेस की आवाज दबाई गई। सभी अखबारों के बिजली कनेक्शन काट दिए गए। अगले दिन अखबार का संपादकीय पन्ना खाली था। मैं सात महीने जेल में रहा। बाद में अंडरग्राउंड होकर काम किया। हम साइक्लोस्टाइल मशीन से पत्रिकाएं छापते थे और गुपचुप तरीके से स्कूल के बच्चों के बैग में डाल देते थे, ताकि उनके जरिए लोगों तक सच पहुंच सके।

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लोग बात करने से भी डरते थे : भगत 
अरुण भगत कहते हैं कि उस समय पूरे देश में भय का माहौल था। लोग एक-दूसरे से खुलकर बात करने से भी डरते थे। वे बताते हैं कि आपातकाल के दौरान एक लाख 10 हजार गिरफ्तारियां हुईं। उस समय लंदन टाइम्स में 500 सांसदों, नोबेल पुरस्कार विजेताओं, लेखकों और पत्रकारों ने हस्ताक्षर के साथ आपातकाल की ज्यादती के बारे में विज्ञापन दिया था। मेरे पिता शिक्षक थे। नसबंदी का लक्ष्य पूरा नहीं कर पाए, इसलिए उनका वेतन रोक दिया गया था। 

15 दिन अंडरग्राउंड रहा, : भाटिया 
एबीवीपी के वरिष्ठ नेता रहे राजकुमार भाटिया बताते हैं कि आपातकाल लागू होने के बाद वे करीब 15 दिन तक भूमिगत रहे। उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया और करीब 19 महीने तिहाड़ जेल में रहना पड़ा। वो कहते हैं, उस समय दिल्ली के दरियागंज में एक रिश्तेदार के दफ्तर में छिपकर हम लोकतंत्र बचाने की रणनीति बनाते थे। हम भूमिगत साहित्य तैयार करते थे, साइक्लोस्टाइल मशीन से पर्चे और पत्र छपवाते थे और उन्हें अलग-अलग जगहों पर पहुंचाने की योजना बनाते थे। मेरी गिरफ्तारी के समय पुलिस को वे पत्र भी मिल गए, जिन्हें पोस्ट किया जाना था। जेल में मुझे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी। मेरी गिरफ्तारी के समय दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (ड्यूटा) के तत्कालीन अध्यक्ष ओम प्रकाश कोहली, जो बाद में गुजरात के राज्यपाल बने, और उस समय एबीवीपी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री मदन दास मुझसे मिलने आए हुए थे। पुलिस ने उन्हें भी पकड़ लिया।

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