अपनों के बिना गुजरेगी इनकी दिवाली: वृद्धाश्रमों में अकेले मनेगी बुजुर्गों की दीपावली, आंखें कर रहीं इंतजार
यमुनापार की सपना, राजू, शकुंतला और शशिकांत जैसे बुजुर्ग दिल्ली के वृद्धाश्रमों में अपनों से दूर दिवाली मना रहे हैं। वे परिवार के साथ की चाहत रखते हैं।
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दिवाली यानी खुशियों, रोशनी और अपनों के साथ का त्योहार। आज घरों में दीये जलेंगे, बच्चे अपने माता-पिता के साथ खुशियां बांटेंगे और परिवार के लोग एक साथ बैठकर मिठाइयां खाएंगे लेकिन इसी दिल्ली में कुछ बुजुर्ग ऐसे भी हैं, जिनकी दिवाली अपनों के बिना गुजरेगी।
किसी को बेटे-बेटी के आने का इंतजार है तो किसी के जीवन में परिवार के नाम पर अब वृद्धाश्रम के साथी ही रह गए हैं। इन बुजुर्गों के लिए दिवाली का सबसे बड़ा तोहफा महंगी चीज नहीं, बल्कि किसी अपने का पास बैठना और हाल पूछ लेना है।
यमुनापार की रहने वाली सपना की कहानी भी कम दर्दभरी नहीं है। वह बताती हैं कि इस दुनिया में उनका कोई अपना नहीं है। न परिवार है और न ही कोई ऐसा, जिसके आने का इंतजार कर सकें। अब वृद्धाश्रम में रहने वाले लोग ही उनका परिवार बन गए हैं। वह इन्हीं के साथ दिवाली मनाएंगी।
दिल्ली के अलग-अलग वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुजुर्गों की कहानियां अलग हैं, लेकिन उनकी एक चाहत एक जैसी है। त्योहार पर कोई अपना मिलने आ जाए। वृद्धाश्रमों में भी दिवाली की तैयारी है। बुजुर्ग एक-दूसरे के साथ दीये जलाएंगे, मिठाइयां बांटेंगे और त्योहार मनाएंगे।
बच्चों के साथ दीये जलाने की आस अब भी बाकी
अबुल फजल स्थित वृद्धाश्रम में रहने वाले 72 वर्षीय राजू की कहानी दिल को छू जाती है। उनकी एक आंख खराब है। राजू बताते हैं कि बच्चे आंख का इलाज कराने के बहाने उन्हें नागपुर से दिल्ली लेकर आए थे। उन्हें उम्मीद थी कि इलाज के बाद वह फिर अपने परिवार के साथ रहेंगे, लेकिन बच्चे उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़कर चले गए। इसके बाद से परिवार से उनका कोई संपर्क नहीं हुआ। उन्हें यह भी नहीं पता कि उनके बच्चे अब कहां हैं। राजू के लिए दिवाली अब सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि बीते दिनों की याद भी है।
दीये तो जलेंगे, पर अपनों के बिना सूना रहेगा त्योहार
वृद्धाश्रमों में रहने वाली शकुंतला और शशिकांत भी अपनों से दूर दिवाली मना रहे हैं। शकुंतला की आंखें आज भी अपनी बहन का इंतजार कर रही हैं। छह महीने पहले उनकी बहन उन्हें वृद्धाश्रम छोड़कर गई थी। तब से दोनों के बीच बात तक नहीं हुई है। त्योहार नजदीक आते ही उन्हें बहन और परिवार के साथ बिताए दिन याद आने लगते हैं। कभी दिवाली की तैयारियों में पूरा परिवार जुटता था। घर की साफ-सफाई होती थी, पकवान बनते थे और बच्चों के साथ दीये जलाने की खुशी होती थी। अब वही दिन उनकी यादों में रह गए हैं।