प्रदूषण से जंग: दिल्ली में कृत्रिम बारिश की बढ़ी उम्मीद, चीन में 10 दिन में घटा PM 2.5; यहां पटाखों की चुनौती
दिवाली पर प्रदूषण बढ़ने की आशंका के बीच कृत्रिम बारिश से इसे घटाने की उम्मीद जगी है। हालांकि यह स्थायी हल नहीं है और दिल्ली में इसके प्रयोग पहले असफल रहे हैं। विस्तार से पढ़ें पूरी खबर-
विस्तार
दिवाली पर पटाखों का धुआं दिल्ली की पहले से खराब हवा को और जहरीला कर सकता है। ऐसे में कृत्रिम बारिश से प्रदूषण घटाने की उम्मीद फिर बढ़ी है। चीन में 2013 से अब तक करीब 27 हजार बार क्लाउड सीडिंग की जा चुकी है।
अर्थशास्त्री और एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के निर्माता माइकल ग्रीनस्टोन के मुताबिक, शोध में इस तकनीक के बाद 10 दिन तक पीएम 2.5 का स्तर घटने के संकेत मिले हैं। हालांकि, इसे प्रदूषण का स्थायी हल नहीं माना जा सकता। क्लाउड सीडिंग में सिल्वर आयोडाइड जैसे पदार्थों को बादलों में छोड़ा जाता है। इससे पानी की बूंदें बनने की प्रक्रिया तेज होने से बारिश हो सकती है। बारिश हवा में मौजूद धूल को नीचे बैठाने में मदद करती है।
दूसरे क्षेत्र में कम वर्षा का खतरा
ग्रीनस्टोन के मुताबिक, किसी एक क्षेत्र में कृत्रिम बारिश बढ़ाने से आसपास के इलाकों में बाद के दिनों में वर्षा कम हो सकती है। दिल्ली में अक्तूबर 2025 में किए गए कृत्रिम बारिश के प्रयोग सफल नहीं हुए थे। इस वर्ष भी अनुकूल बादलों और पर्याप्त नमी का इंतजार है। दिवाली पर पटाखों से निकले धुएं में पीएम 2.5 व पीएम 10 कण बढ़ जाते हैं। कम हवा चलने और तापमान गिरने पर ये प्रदूषक लंबे समय तक वातावरण में बने रह सकते हैं। ऐसे में कृत्रिम बारिश से कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन वाहनों, उद्योगों व निर्माण कार्यों से होने वाले उत्सर्जन पर रोक लगाए बिना प्रदूषण घटाना मुश्किल है।
माइक्रोप्लास्टिक जांच के लिए एक समान मानक बनाने की तैयारी
नमक व चीनी में माइक्रो प्लास्टिक मिलने की जांच के लिए अब देशभर में एक समान तरीका तैयार किया जा रहा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को आठ सप्ताह में प्रगति रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 4 फरवरी, 2027 को होगी।
सीपीसीबी के अनुसार, पानी, मिट्टी, हवा, समुद्री तलछट व जीवों के शरीर में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक की पहचान के लिए अलग-अलग मानक तैयार किए जा रहे हैं। इसके लिए सीआईपीईटी, एनसीएससीएम व सीएसआईआर-नीरी को जिम्मेदारी दी गई है। नई जांच विधियां तैयार करने व लैब में उनकी पुष्टि में 12 माह लग सकते हैं। मामला 2024 में नमक व चीनी के भारतीय ब्रांडों में माइक्रोप्लास्टिक मिलने तथा 2022 में मानव रक्त में इसके कण मिलने संबंधी खबरों से जुड़ा है।