Ground Report: दुर्भाग्य से कुंडली में आ बैठी टीबी, तीन गांव सर्वाधिक प्रभावित; दिल्ली में 99 हजार मरीज
राजधानी में क्षय रोग (टीबी) की स्थिति देश के अन्य हिस्सों की तुलना में गंभीर है।
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हरियाणा के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र कुंडली की नई पहचान टीबी (तपेदिक) हब की बनती जा रही है। हालात इतने भयावह हैं कि छह साल में टीबी से 105 लोगों की मौत हो चुकी है। सर्वे में 203 फीसदी मरीज बढ़े मिले हैं। इनमें 70% संक्रमित बिहार और सीतापुर (उत्तर प्रदेश) के हैं। 65 फीसदी मकान मालिक घर किराये पर देकर कहीं और बस रहे हैं।
देश की राजधानी दिल्ली से सिर्फ 30 किलोमीटर दूर कुंडली की यही कहानी है। यहां के तीन गांव बढ़ मलिक, जठेड़ी और लिवान टीबी से सर्वाधिक प्रभावित हैं। इनमें भी स्थानीय से अधिक प्रवासी चपेट में हैं। प्रवासियों के लिए बीमारी सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं बल्कि रोजगार, घर और सम्मान खोने की खौफनाक दास्तां भी है। काम छिन जाने के डर से लोग बीमारी बताते ही नहीं हैं।
हरियाणा में नूंह के बाद सोनीपत में सर्वाधिक संक्रमित दर
सोनीपत प्रदेश में दूसरा सबसे ज्यादा संक्रमित दर वाला जिला है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से सात दिसंबर 2024 से 19 अक्तूबर 2025 के बीच की गई स्क्रीनिंग में नूंह में सर्वाधिक 20 फीसदी टीबी संक्रमण दर मिली थी। सोनीपत में यह दर 18 फीसदी रही। इसे चिंताजनक बताया गया है।
कुंडली में हैं 3000 से अधिक फैक्टरियां
कुंडली और राई औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना कई चरणों में हुई थी। फेज-वन 1982 में, फेज-टू 1984 में, ईपीआईपी (निर्यात प्रोत्साहन औद्योगिक पार्क) 1999 में और चौथा चरण 2000 में शुरू हुआ था। इसे हरियाणा औद्योगिक और अवसंरचना विकास निगम ने विकसित किया है। यहां 3000 से अधिक फैक्टरियां हैं जहां कई लाख प्रवासी मजदूर काम कर रहे हैं।
केमिकल और पेंट फैक्टरियों में मानकों का उल्लंघन
बढ़ मलिक के जगदीश, श्याम चोपड़ा, रणबीर व धर्मवीर कहते हैं कि फैक्टरियों में प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के मानकों का खुलेआम उल्लंघन होता है। थर्मो प्लास्टिक, वेल्डिंग, फूड पार्क, इलेक्ट्रोप्लेटिंग और केमिकल फैक्टरियों में घातक रसायन निकलते हैं। पेंट, धागे, गत्ता पैकिंग की फैक्टरियों के वेस्टेज के कारण सांस लेना दूभर है। चोरी छिपे फैक्टरियां कचरा जलाती हैं जिसका धुआं इतना भयंकर है कि दम घुटने लगता है। ग्रामीणों का आरोप है कि 300 से अधिक फैक्टरियों में ट्रीटमेंट प्लांट ही नहीं हैं। दूषित पानी सीधे जमीन में छोड़ने से भूजल भी पीने लायक नहीं रहा। इससे जानलेवा बीमारियां बढ़ रही हैं।
कुंडली में समय–समय पर श्रमिकों का हेल्थ चेकअप कराते हैं। इसमें श्रमिकों की सभी जांच कराई जाती हैं। श्रमिकों के ईएसआई कार्ड भी हैं। जरूरत पड़ने पर कार्ड से भी इलाज कराते हैं।
-सुभाष गुप्ता, वरिष्ठ उप प्रधान, कुंडली इंडस्ट्रियल एरिया एसोसिएशन।
प्रदूषण की शिकायत पर बोर्ड की टीम तुरंत जांच और कार्रवाई करती है। इस बार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीमों ने जांच की है, इकाइयां सील की हैं। जल प्रदूषण की शिकायत आई तो जांच कराकर कार्रवाई करेंगे।
- कुशाग्र कादियान, एसडीओ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
स्थानीय से ज्यादा प्रवासी चपेट में
टीबी हब बने कुंडली से तीनों गांवों के 65 प्रतिशत से अधिक घरों के मालिक बीमारियों से घबराकर कहीं और बस चुके हैं। इससे गांवों की बसावट ही बदल चुकी है। मसलन, बढ़ मलिक गांव की 12500 आबादी में स्थानीय 3000 ही हैं, बाकी 9500 प्रवासी मजदूर।
- 8000 की आबादी वाले जठेड़ी गांव में स्थानीय करीब 3000 ही बचे हैं, बाकी 5000 प्रवासी हैं। 3700 की आबादी वाले लिवान में स्थानीय लोग तो 1200 ही हैं, शेष 2500 प्रवासी मजदूर।
2025 में दवा छोड़ने से 8 लोगों की गई जान
स्वास्थ्य विभाग से मिले आंकड़ों के मुताबिक, कुंडली क्षेत्र में साल 2025 में दवा छोड़ने से तीन मरीजों की माैत हुई है। बाकी मरने वाले 8 मरीजों को टीबी के साथ एचआईवी और डायबिटीज जैसी अन्य बीमारियां थीं।
दिल्ली में 99 हजार मरीज
राजधानी में क्षय रोग (टीबी) की स्थिति देश के अन्य हिस्सों की तुलना में गंभीर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 और निक्षय पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में टीबी की घटना दर देश में सबसे ऊंची है, जो प्रति लाख जनसंख्या पर लगभग 499-546 मामलों तक अनुमानित है। यह राष्ट्रीय औसत (187 प्रति लाख) से काफी अधिक है।
निक्षय पोर्टल के नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों जनवरी से अक्तूबर 2025 तक के अनुसार, दिल्ली में इस अवधि में 98,309 टीबी के मामले नोटिफाइड किए गए हैं। पूरे वर्ष का अनुमान इससे अधिक होने की संभावना है, क्योंकि दिल्ली की आबादी लगभग 3.2 करोड़ है और शहरी घनत्व, झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों तथा प्रवासी आबादी के कारण यहां टीबी का प्रसार तेजी से होता है।
वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने 2015 से 2024 तक टीबी की घटना दर में 21 फीसदी की कमी दर्ज की है, जो वैश्विक औसत से दोगुनी है। हालांकि, दिल्ली जैसे उच्च बोझ वाले क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि झुग्गी बस्तियां, प्रदूषण और पोषण की कमी जैसे कारक यहां टीबी को बढ़ावा देते हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत दिल्ली में सक्रिय केस फाइंडिंग, निजी क्षेत्र की भागीदारी और निक्षय पोषण योजना जैसी पहलों से मामलों की बेहतर रिपोर्टिंग हो रही है। फिर भी, मल्टीड्रग रेसिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) के मामले और उपचार में अंतराल चिंता का विषय हैं।