'हार के डर से पैतृक जमीन भूल गए केजरी'
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आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर पार्टी के संस्थापक सदस्य और वरिष्ठ नेता शांति भूषण की ओर से बयान आने के बाद उन पर चौतरफा हमले शुरू हो गए हैं।
विरोधी दलों ने तो केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खेल रखा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के नेताओं ने केजरावाल को निशाने पर लिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर लवली की ओर से जारी बयान के बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने भी केजरी पर हमला बोला है।
उपाध्याय ने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने राजनीति को हास्यास्पद स्थिति पर ला दिया है। उनकी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। वे खुद को त्याग की मूर्ति की तरह दर्शाना चाहते हैं लेकिन असलियत कुछ और ही है।
'हार के बाद चुनाव से डरने लगे हैं केजरी'
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि केजरीवाल जैसा दिखाते हैं वैसे हैं नहीं। वह पद के लालची हैं। केजरीवाल एक तरफ तो पारदर्शिता और प्रजातंत्र की बात करते हैं पर अपनी पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र का गला घोंटकर रखते हैं।
उपाध्याय ने केजरीवाल के राजनीतिक नेतृत्व क्षमता पर उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य शांति भूषण के उठाए सवाल के बाद अपनी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि शांति भूषण को इस बात का अहसास होने में तीन साल लग गए। भाजपा तो देश की जनता को यह बहुत पहले ही समझा चुकी है। यही वजह थी कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद केजरीवाल चुनाव के नाम से भागने लगे हैं।
उपाध्याय की इस बात को 'आप' विधायक राजेश गर्ग के बयान से और बल मिला है जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल की राय से इतर, पार्टी के 27 में से 25 विधायक चुनाव लड़ने से पीछे हट रहे हैं।
पैतृक जमीन को भूल गए केजरीवाल!
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने हरियाणा में आम आदमी पार्टी के चुनाव न लड़ने के फैसले पर चुटकी लेते हुए कहा हरियाणा को अपनी पैतृक जन्मभूमि बताने वाले केजरीवाल वहां चुनाव तक नहीं लड़ना चाहते।
यही नहीं, 'आप' के चाणक्य कहे जाने वाले योगेंद्र यादव भी हरियाणा के ही रहने वाले हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में उन्हें भी करारी हार झेलनी पड़ी थी। पार्टी ने लोकसभा चुनावों में हार के बाद दिल्ली में ही खुद को मजबूत करने का फैसला लिया है। इससे हरियाणा में पार्टी कार्यकर्ताओं में खासी नाराजगी है।
सतीश उपाध्याय ने कहा कि हाल ही में कांग्रेस के दो विधायकों ने भी यह स्पष्ट किया था कि दिल्ली में फिर से एक गठबंधन सरकार बन सकती थी अगर केजरीवाल अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया को मुख्यमंत्री स्वीकार कर लेते। इसी तरह उनकी पार्टी में लगातार पदों के लिए संघर्ष चलता रहता है।