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Delhi NCR News: सरोगेसी की अनुमति मांग रहे दंपती को वर्चुअल सुनवाई की इजाजत
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- हाईकोर्ट ने सरोगेसी बोर्ड का आदेश रद्द किया, बोर्ड ने व्यक्तिगत उपस्थित होने के लिए कहा था
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने कनाडा में रह रहे एक भारतीय दंपती को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने जिला चिकित्सा बोर्ड के सामने सरोगेसी से जुड़ी कार्यवाही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने की अनुमति दे दी। बोर्ड के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें दंपती से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा गया था।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने कहा कि जिला चिकित्सा बोर्ड का मुख्य काम दंपकी के मेडिकल रिकॉर्ड की जांच करना है ताकि पता लगाया जा सके कि क्या उन्हें ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेडिकल इंडिकेशन’ जारी किया जा सकता है। इस चरण में शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य करने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बोर्ड को मामले को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए और वर्चुअल उपस्थिति की अनुमति देनी चाहिए। यदि दंपती से कोई स्पष्टीकरण चाहिए तो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ही पर्याप्त है।
अदालत ने टिप्पणी की कि सरोगेसी रेगुलेशन 2023 के तहत राज्य बोर्ड को वर्चुअल सुनवाई की सुविधा अनिवार्य रूप से उपलब्ध करानी पड़ती है तो जिला बोर्ड को भी इसके लिए खुद को तैयार करना चाहिए। बोर्ड के वकील ने विरोध जताते हुए कहा कि शारीरिक उपस्थिति जरूरी है ताकि किसी भी तरह के शोषण की आशंका को पूरी तरह खत्म किया जा सके। हाईकोर्ट ने बोर्ड का यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड की जांच मुख्य कार्य है और दंपति का अधिकृत प्रतिनिधि सभी मूल दस्तावेज लेकर बोर्ड के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होगा।
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यह है मामला
यह दंपती साल 2015 में शादी के बाद 2022 से कनाडा में रह रहा है और काम कर रहा है। संतान न होने के कारण उन्होंने दिल्ली दक्षिण जिले के चिकित्सा बोर्ड से ‘गेस्टेशनल सरोगेसी के लिए मेडिकल इंडिकेशन सर्टिफिकेट’ मांगा था और वर्चुअल सुनवाई की अनुमति भी मांगी थी। हालांकि बोर्ड ने मार्च में आदेश जारी कर उन्हें शारीरिक रूप से उपस्थित होने को कहा और वर्चुअल भागीदारी की अनुमति देने से इन्कार कर दिया।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने कनाडा में रह रहे एक भारतीय दंपती को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने जिला चिकित्सा बोर्ड के सामने सरोगेसी से जुड़ी कार्यवाही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने की अनुमति दे दी। बोर्ड के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें दंपती से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा गया था।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने कहा कि जिला चिकित्सा बोर्ड का मुख्य काम दंपकी के मेडिकल रिकॉर्ड की जांच करना है ताकि पता लगाया जा सके कि क्या उन्हें ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेडिकल इंडिकेशन’ जारी किया जा सकता है। इस चरण में शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य करने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि बोर्ड को मामले को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए और वर्चुअल उपस्थिति की अनुमति देनी चाहिए। यदि दंपती से कोई स्पष्टीकरण चाहिए तो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ही पर्याप्त है।
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अदालत ने टिप्पणी की कि सरोगेसी रेगुलेशन 2023 के तहत राज्य बोर्ड को वर्चुअल सुनवाई की सुविधा अनिवार्य रूप से उपलब्ध करानी पड़ती है तो जिला बोर्ड को भी इसके लिए खुद को तैयार करना चाहिए। बोर्ड के वकील ने विरोध जताते हुए कहा कि शारीरिक उपस्थिति जरूरी है ताकि किसी भी तरह के शोषण की आशंका को पूरी तरह खत्म किया जा सके। हाईकोर्ट ने बोर्ड का यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड की जांच मुख्य कार्य है और दंपति का अधिकृत प्रतिनिधि सभी मूल दस्तावेज लेकर बोर्ड के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होगा।
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यह है मामला
यह दंपती साल 2015 में शादी के बाद 2022 से कनाडा में रह रहा है और काम कर रहा है। संतान न होने के कारण उन्होंने दिल्ली दक्षिण जिले के चिकित्सा बोर्ड से ‘गेस्टेशनल सरोगेसी के लिए मेडिकल इंडिकेशन सर्टिफिकेट’ मांगा था और वर्चुअल सुनवाई की अनुमति भी मांगी थी। हालांकि बोर्ड ने मार्च में आदेश जारी कर उन्हें शारीरिक रूप से उपस्थित होने को कहा और वर्चुअल भागीदारी की अनुमति देने से इन्कार कर दिया।