Delhi: देश की पहली इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट खुली, 15 एकड़ क्षेत्रफल में है फैला; क्षमता 9.65 लाख मीट्रिक टन
इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट चालू होने के बाद अब ओखला लैंडफिल साइट के कूड़े से निकलने वाली दुर्गंध से निजात मिलेगी। ओखला लैंडफिल साइट के बगल तेहखंड में 15.47 एकड़ क्षेत्रफल में इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट को बनाया गया है।
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दक्षिण पूर्व दिल्ली में मंगलवार को खोली गई इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट से न ही मिट्टी दूषित होगी और भूजल व हवा मैली नहीं होगी। हरदिन करीब 500 टन ठोस कचरे का निपटान होगा, लेकिन कूड़े की दुर्गंध लोगों को परेशान नहीं करेगी। ओखला के तेहखंड में करीब दो साल में बनकर तैयार देश की पहली इंजीनियरिंग लैंडफिल साइट का एलजी वीके सक्सेना और सीएम अरविंद केजरीवाल ने एक साथ मिलकर उद्घाटन किया।
सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा, इस आधुनिक प्लांट में कूड़े के निस्तारण के बाद निकली राख को प्रोसेस करने की व्यवस्था होगी। दिल्ली को स्वच्छ बनाने के लिए इनकी सरकार लगातार काम कर रही है और इसमें सफलता मिल रही है। एलजी और सीएम ने इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट पर नामपट्टिका का अनावरण किया और नारियल फोड़कर परियोजना की शुरुआत की गई। इसके बाद दोनों ने प्लांट का फाइनल मॉडल देखा और इंजीनियर्स से प्रोजेक्ट की जानकारी ली। नगर निगम की कूड़ा गाड़ियों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इधर एलजी ने कहा, इस अत्याधुनिक संयंत्र के चालू हो जाने से कूड़े के वैज्ञानिक निपटान में काफी सहायता मिलेगी। इस दौरान मेयर डॉ शैली ओबरॉय, डिप्टी मेयर आले मोहम्मद इकबाल समेत एमसीडी के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
नहीं दिखेगी कूड़ा, दुर्गंध से मिलेगी निजात
इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट चालू होने के बाद अब ओखला लैंडफिल साइट के कूड़े से निकलने वाली दुर्गंध से निजात मिलेगी। ओखला लैंडफिल साइट के बगल तेहखंड में 15.47 एकड़ क्षेत्रफल में इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट को बनाया गया है। इसकी क्षमता 9.65 लाख मीट्रिक टन है। वेस्ट टू एनर्जी प्लांट से निकली हुई राख को इसमें निस्तारित किया जाएगा। इस राख को डालने के लिए एमसीडी को 300 रुपये प्रति टन के हिसाब से राशि मिलेगी। यहां रोजाना करीब 500 टन राख डाली जाएगी। इसके अलावा 100 किलो लीटर हरदिन छमता का लीचेट ट्रीटमेंट प्लांट बनाया गया है। करीब आधे एकड़ में लीचेट प्लांट को बनाया गया है। लैंडफिल साइट के आस पास ग्रीन एरिया बनाने के लिए इसके 7.42 एकड़ क्षेत्र को रिजर्व फॉरेस्ट क्षेत्र के रूप में रखा गया है। इसके निर्माण में 42.31 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
वैज्ञानिक तकनीक से बनी है लैंडफिल साइट
इंजीनियरिंग लैंडफिल साइट वैज्ञानिक तरीके से बनी है। इसमें पहले सात मीटर गड्ढा खोदकर मिट्टी की दो परत डाली गई है। उसके बाद तीन परत लाइनर की डाली गई है। फिर पाइपलाइन डालकर फिर से एक परत लाइनर और एक परत मिट्टी डालकर तैयार किया है।
अन्य साइटों से बिल्कुल अलग
देश की ये पहली इंजीनियर्ड लैंडफिल साइट अन्य लैंडफिल साइट से बिल्कुल अलग है। दिल्ली में मौजूदा समय हरदिन करीब 12000 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। ठोस या वेस्ट टू एनर्जी प्लांट में जले कचरे की राख के रूप में ये कूड़ा दिल्ली की तीन लैंडफिल साइटों पर ही जाता है। बारिश के दिनों में लैंडफिल साइटों पर जमा लिचेट जमीन में चला जाता है। इसकी वजह से भूजल प्रदूषित होता है।