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अधीर मन पर पड़ रहा सीधा असर: मोबाइल न मिलने पर आक्रामक हो रहे बच्चे, अपनों के साथ खुद को पहुंचा रहे नुकसान

Fri, 18 Nov 2022 08:46 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Fri, 18 Nov 2022 08:46 PM IST
सार

चीन के बाद भारतीय यूजर्स विश्व में सर्वाधिक ऐप डाउनलोड करते हैं। वर्ष 2021 में देश में गूगल प्ले स्टोर और ऐप स्टोर से 26 अरब 70 करोड़ एप्स डाउनलोड किए गए।

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Children getting aggressive on not getting mobile
मोबाइल न मिलने पर आक्रामक हो रहे बच्चे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सेहत खराब करने के साथ मोबाइल की लत बच्चों व किशारों को हिंसक भी बना रही है। मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से उन पर अच्छी-बुरी सूचनाओं की बौछार हुई है। इसका सीधा असर उसके अधीर मन पर पड़ा है। सही-गलत में फर्क किए बिना वह हर उस चीज पा लेना चाहता है, जो उसे पसंद है। इसी चक्कर में बच्चे आक्रामक हो रहे हैं और खुद के साथ अपनों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट बताती है कि बीते साल नाबालिग अपराधियों की संख्या में आठ फीसदी इजाफा हुआ है। विशेषज्ञ इसकी बड़ी वजह मोबाइल की लत बता रहे हैं। वह मोबाइल में दिखने वाली शौन-शौकत से भरपूर और बादशाहत वाली जिंदगी जीने की लालसा पाल लेते हैं। नतीजा जिसका उनको अपराध की दुनिया में ला पटकता है।

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दायरा के साथ ख्वाहिशें भी बढ़ीं
विशेषज्ञों का मानना है कि घटनाएं बेशक तीन हैं, लेकिन यह बच्चों में पनप रही आपराधिक प्रवृत्ति की तरफ इशारा कर रही हैं। मोबाइल ने किशारों की पहुंच का दायरा भी बढ़ाया है और ख्वाहिशें भी। पहले वह नई-नई चीजें देखते हैं, फिर उससे पाने का तरीका। इस दौरान अगर कोई अपराध होता है तो मोबाइल ही उनको बचने का तरीका भी बता देता है। हर चीज उनको पैकेज से मिल रही है। वहीं, यह उम्र का वह पड़ाव होता है, जहां उनमें संयम नहीं रहता। जहांगीरपुरी का वाकया तो ज्यादा हैरान करने वाला है। किशोर ने जिस तरह घटना को अंजाम दिया और उसका फिल्मांकन भी करवाया, उससे साफ पता चलता है कि अपराध करने से ज्यादा उसकी कोशिश प्रसिद्धि पाने की थी। तभी उसने वीडियो को वायरल किया। पुलिस भी मानती है कि अपने लोगों के बीच रौब जमाने के लिए उसने इस तरह का कृत्य किया है।

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नशेड़ियों जैसी हो जाती है प्रवृति
दिल्ली साइकेट्रिक सोसायटी के उपाध्यक्ष व वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. पंकज कुमार के मुताबिक, पढ़ाई के साथ रोचक गेम्स व उत्तेजक वीडियो देखने से दिमाग में डोपामाइन (रासायनिक संदेशवाहक) को एक किक मिली। इसने उसको खुश किया। बार-बार देखने से उसमें उत्तेजना की प्रकृति नशेड़ियों जैसी रही। बच्चे मोबाइल की इसे पाने के लिए कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी सोचने-समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है। इससे कोई भी हद उनके लिए मायने नहीं रखती। मोबाइल हासिल करने के लिए घर या बाहर चोरी करते हैं। हिंसक होकर दूसरों पर वार करते हैं। कई बार परेशान होकर आत्महत्या तक की कोशिश कर बैठते हैं। कोरोना काल से देश में मोबाइल के लत तेजी से बढ़ी है।

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केस-1
कोविड के दौरान पढ़ाई के लिए मोबाइल मिलने पर दसवीं का एक बच्चा ऑनलाइन गेम्स खेलने के साथ वेब सीरीज भी देेखने लगा। इसका असर स्कूल खुलने के बाद समझ में आया। मोबाइल फोन ले लेने से उसकी व्यवहार नशेड़ियों जैसा हो गया। उसने मां के गहने चोरी कर मोबाइल खरीदा और चुपके से उसका इस्तेमाल करने लगा। पता लगने पर जब पिता ने सख्ती बढ़ाई तो बेटा पंखे से लटक गया। संयोग ठीक था कि पिता को इसी भनक मिली और बच्चे को लेकर अस्पताल पहुंचे। उसका इलाज अभी भी डॉ. पंकज कुमार के क्लीनिक में चल रहा है।

केस नंबर-2
मोबाइल के चक्कर में कंझावला में कुछ दिनों पहले 13 साल के एक किशोर ने अपने आठ वर्षीय दोस्त की हत्या कर दी थी। हुआ यह कि दोनों पास के तालाब पर गए थे। उनके हाथ में मोबाइल थे, लेकिन आरोपी का मोबाइल डिस्चार्ज हो गया। मांगने पर मना करते ही आरोपी ने ईंट मार-मार कर दोस्त की हत्या कर दी। खुद को बचाने के लिए उसका शव को जंगल में फेंक दिया। बाद में पुलिस जांच में इसका खुलासा हुआ।

केस नंबर-3
जहांगीरपुरी में एक किशोर ने मोबाइल पर बार-बार दक्षिण भारतीय फिल्म पुष्पा देखी। फिल्म का नशा उस पर इस कदर चढ़ा कि एक शाम उसने सरेराह एक राहगीर की हत्या कर दी। उसके दोस्त ने पूरी घटना का वीडियो बनाया और उसको सोशल मीडिया पर वायरल भी किया। दोनों किशोरों का पकड़कर पुलिस ने बाल सुधार गृह में भेजा दिया है।

किशोरों में नहीं रहता संयम
किशोर उम्र के बच्चों में संयम रखने की क्षमता नहीं होती है। उन्हें सब कुछ तुरंत चाहिए होता है। यदि वह नहीं मिलता तो बच्चे आक्रामक हो जाते हैं। नई तकनीक के साथ बच्चों के हाथ में आया मोबाइल उनकी इन जरूरतों को पलभर में पूरा कर देता है। यही कारण है कि वह आसानी से इनकी लत में फंस जाते हैं और इसे पाने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। मोबाइल पाने के लिए वह चोरी करने, मारपीट करने से भी पीछे नहीं हटते। बच्चों को समझा पाना काफी मुश्किल होता है। वह मोबाइल फोन को लेकर जिद्दी हो जाते हैं। -डॉ. सिद्धार्थ सूद, मनोरोग विशेषज्ञ, ईएसआईसी अस्पताल, ओखला

मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए दिल्ली पुलिस बच्चों को जागरूक करती है। स्कूलों में नियमित कार्यक्रम होते हैं। बच्चों को इसकी विसंगतियों के बारे में बताया जाता है। अपराध को अंजाम देने वाले नाबालिगों की भी पुलिस काउसलिंग करती है, ताकि वह अपराध का रास्ता न चुने। फिर ऐसे बच्चों को बाल सुधार गृह में भेजा जाता है। -उषा रंगनानी, पुलिस उपायुक्त, उत्तर पश्चिम जिला

एनसीपीसीआर की मार्च 2022 की रिपोर्ट
. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की रिपोर्ट बताती है कि 59.2 फीसदी बच्चे संदेश भेजने के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं।
. इनमें से केवल 10.1 फीसदी बच्चे ही शैक्षिक काम के लिए मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं।
. 30.2 फीसदी बच्चों के पास अपना स्मार्टफोन है।
. 8 से 18 आयु वर्ग के 20 फीसदी बच्चे सोने से पहले बिस्तर में स्मार्ट फोन का उपयोग करते हैं।
. 10 साल के 37.8 फीसदी बच्चों का फेसबुक और 24.3 फीसदी बच्चों का इंस्टाग्राम अकाउंट है।

मैकफी का सर्वे
- 2021 में आई मैकफी की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 10-14 वर्ष की आयु के बच्चों में स्मार्टफोन का उपयोग 83% है, जो 76% के अंतर्राष्ट्रीय औसत से 7% अधिक है।
- अध्ययन में पाया गया कि लगभग 22 फीसदी भारतीय बच्चों ने कभी न कभी साइबर बुलिंग का अनुभव किया, जो 17 फीसदी के वैश्विक औसत से 5 फीसदी अधिक था।
- वित्तीय जानकारी लीक करने के मामले में भारत के भारतीय बच्चे विश्व के बच्चों के 13 फीसदी के मुकाबले 23 फीसदी है।

दुनिया में किशोरों में मोबाइल की लत
72 फीसदी सुबह उठते ही मोबाइल पर मैसेज और नोटिफिकेशन चेक करते हैं।
56 फीसदी फोन पास न होने पर अकेला और उदास महसूस करते हैं।
54 फीसदी स्वीकारते हैं कि वे मोबाइल पर जरूरत से ज्यादा समय बिताते हैं।
47 फीसदी माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे स्मार्टफोन के आदी हो चुके हैं।
27 फीसदी डिप्रेशन की आशंका बढ़ जाती है सोशल मीडिया का प्रयोग अधिक करने से।
(सभी डेटा बैंकमाइसेल, रिव्यूज डॉट ओआरजी से)

69.9 करोड़ घंटे सिर्फ मोबाइल देखने में बिताए
ऐप मॉनिटरिंग फर्म ऐप एनी के मुताबिक पिछले साल भारतीयों ने 69.9 करोड़ घंटे सिर्फ मोबाइल देखने में बिताए। इसका प्रमुख कारण अन्य देशों के मुकाबले सस्ता इंटरनेट है। भारतीय औसतन 4.7 घंटे मोबाइल देखते हैं। चीन के बाद भारतीय यूजर्स विश्व में सर्वाधिक ऐप डाउनलोड करते हैं। वर्ष 2021 में देश में गूगल प्ले स्टोर और ऐप स्टोर से 26 अरब 70 करोड़ एप्स डाउनलोड किए गए।

19.5 फीसदी बच्चे गेम के लती
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस बंगलूरू की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार 13-18 आयुवर्ग के 19.5 बच्चे मोबाइल गेमिंग के लती हैं, 18% बच्चे इंटरनेट तो 15.5 बच्चों को सेलफोन की लत है।

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