बिसाहड़ा बवाल : इंटरनेट पर तैर रही हर खबर सच नहीं
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सच का शायद एक ही चेहरा होता है लेकिन झूठ के कई। बिसाहड़ा मामले में ऐसा ही हो रहा है। कुछ न्यूज पोर्टल और सोशल नेटवर्क़िंग साइट्स ने जिस तरह माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया वह बेहद चिंतनीय है।
साथ ही पुलिस और प्रशासन के लिए बड़ी सिरदर्दी है कि सोशल मीडिया के विस्तार को देखते हुए किस तरह ऐसी घटनाओं पर रोक लगाए।
कुछ उदादहरण देखिये। हाल में एक न्यूज पोर्टल ने लिखा कि केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता मेनका गांधी से संबंधित संगठन पीपुल फार एनिमल (पीएफए) के दो स्वयंसेवी बिसाहड़ा कांड से जुड़े हैं। मेनका ने इसे गलत बताया और प्रशासन ने पोर्टल पर कार्रवाई की।
मनमाने ढंग से खबरों पेश किया जाना घटना के तत्काल बाद से ही शुरू हो गया था। एक अंग्रेजी अखबार ने प्रमुखता से खबर लगाई कि आरोपी होमगार्ड है, जिसे गिरफ्तार कर पुलिस पूछताछ कर रही है।
बाद में यह बात एकदम निराधार निकली। इसी अखबार ने एक दिन लिखा कि इकलाख ने अंतिम काल अपने एक हिंदू दोस्त को कोल की थी। बाद में इसी अखबार ने खंडन करते हुए लिखा कि जिस दोस्त का जिक्र है उस नाम का कोई आदमी गांव में नहीं रहता।
सच जाने बगैर ही किया गया शेयर
अखबार ने इकलाख की बेटी शाइस्ता के हवाले से दलील दी कि अगर किसी पर हमला हो तो वह फोन करेगा या अपनी जान बचाएगा। इसी तरह यह भी लिखा गया कि इकलाख डेढ़ साल पहले पाकिस्तान गया था और वहां से आने के बाद उसमें बदलाव आ गया था।
इकलाख के परिजनों ने इसका विरोध किया और बताया कि सचाई यह है कि इकलाख वर्ष 1988 में पाकिस्तान गया था और उसके बाद उसने अपना पासपोर्ट रिन्यू भी नहीं कराया।
एक अंग्रेजी दैनिक में यह भी लिखा गया कि इकलाख के भाई जान मोहम्मद से मिलने उनका एक पुराना साथी गया तो उसके दफ्तर को उपद्रवियों ने जला दिया। जबकि जान मोहम्मद ने साफ किया वे तो उसे जानते ही नहीं।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स के दुरुपयोग की एक और मिसाल देखिये। जिस दिन आरोपी विशाल गिरफ्तार हुआ टीवी चैनलों ने खबर को दिखाना शुरू किया कि आरोपी के पिता भाजपा से जुड़े हैं।
कुछ देर में नीचे की पट्टी को बदलकर उसे आम आदमी पार्टी कर किसी ने फेसबुक पर डाल दिया, जिसमें कहा गया कि आरोपी आप से है।
ट्विटर और व्हाट्स एप पर लोगों ने इस कांड के फोटो बिना सच जाने शेयर करने शुरू कर दिए। ऐसी घटनाओं के बाद प्रशासन ने ट्विटर से नफरत भड़काने वाले मैसेज हटाने को कहा था।