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बरतन मांजने वाली यह महिला आज है देश का गौरव

Fri, 23 Jan 2015 08:43 PM IST
Updated Fri, 23 Jan 2015 08:43 PM IST
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 Bangla writer Baby haldaar used work as domestic help

बेबी हालदार आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है। दूसरों के घरों में काम करने वाली बेबी हालदार कैसे लेखिका बन गई? यह बेहद प्रेरणादायक और संघर्षपूर्ण दास्तान है।

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फरीदाबाद और गुड़गांव की गलियों में कभी बरतन मांजने का काम ढूंढने वाली बेबी आज बांग्ला साहित्य का चर्चित नाम है। तसलीमा नसरीन ने उनकी लिखी हुई साहित्य का विमोचन किया है।
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उनकी पहली किताब ‘आलो आंधारिश्’ साल 2013 में हिंदी में प्रकाशित हुई।  अब तक इसके दो संस्करण छप चुके हैं। बांग्ला संस्करण भी प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा विश्व के 16 भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है।
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फिलहाल, वह गुड़गांव के साउथ सिटी फेज-1 में रहती हैं। उनकी लिखी किताब को दो बार बेस्ट सेलिंग बुक का खिताब मिल चुका है। इसके बावजूद आज भी वो लेखिका कहलाने से गुरेज करती है।

किताबें साफ करते मालिक ने किया प्रेरित

 Bangla writer Baby haldaar used work as domestic help

बेबी हालदार कहती हैं, ‘आज मैं जो भी हूं, इसके पीछे मेरे मालिक प्रबोध कुमार का हाथ है। वो सिर्फ मेरे मालिक ही नहीं, बल्कि साहित्यिक गुरू और अनुवादक भी हैं।’

वह जिस घर में चौका-बरतन करती थीं, उसके एक कमरे की तीन अलमारियां किताबों से भरी थीं। उनमें बांग्ला की भी बहुत सी किताबें थीं। उन्हें देखकर मन में यह बात उठती कि इन्हें कौन पढ़ता होगा?

कभी-कभी वह एक-दो किताब खोलकर देख भी लेती। एक बार सफाई करते समय मालिक ने किताब पलटते हुए देख लिया। उसके बाद उन्होंने प्रेरित किया और हर दिन कुछ न कुछ लिखने को देते। यही बाद में किताब की शक्ल ले ली।

जम्मू से गुड़गांव तक का सफर

 Bangla writer Baby haldaar used work as domestic help

40 साल पहले जम्मू-कश्मीर में पैदा हुई बेबी के पिता सेना में थे। अचानक मां के गायब होने के बाद पिता ने एक के बाद एक तीन शादियां कीं।

सातवीं तक पढ़ाई करने के बाद13 साल की उम्र में अपने से दोगुने उम्र के युवक से शादी हो गई। पति की प्रताड़ना और पैसों की तंगी के बीच जिल्लत भरे दिन से तंग आकर वह बच्चों को लेकर घर से निकल गई।

दिल्ली से फरीदाबाद और फिर गुड़गांव आईं। यहां लंबे समय तक अलग-अलग घरों में नौकरानी का काम किया। इसी दौर में गुड़गांव मेें प्रबोध कुमार के घर में भी काम मिला।

कुछ समय बाद उन्होंने घर में रहने की जगह दे दी। पिछले 15 सालों से उन्हीं के साथ रह रही है। अब उनकी बेटी बड़े गर्व के साथ अपनी मां का परिचय देती हैं।

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