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अमेरिका ने माना एम्स का लोहा: द टारगेट अल्फा थेरेपी से कैंसर पर किया सीधा वार, तीन साल तक बढ़ी उम्र

Wed, 24 May 2023 10:07 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Wed, 24 May 2023 10:07 PM IST
सार

अल्फा थेरेपी में दो प्रोटीन और दो न्यूटॉन का इस्तेमाल किया गया है। यह बीटा थेरेपी से 20 गुणा ज्यादा ताकतवर है। यह एक एडवांस वर्जन है।

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AIIMS study on serious cancer patients target alpha therapy patients struggling between life and death got rel
AIIMS (एम्स) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

शरीर में गंभीर हो चुके कैंसर पर सीधे वार करके एम्स ने मरीजों की जिंदगी में तीन साल और बढ़ा दिए हैं। इस तकनीक में एम्स ने अल्फा किरणों को ड्रोन की तरह इस्तेमाल करके दवा को सीधे कैंसर टिशू तक पहुंचाया, जिसमें कैंसर सेल को 100 फीसदी तक खत्म करने का दावा किया जा रहा है। 

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दरअसल एम्स के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग ने बीआर अंबेडकर रोटरी कैंसर अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के सहयोग मेटास्टैटिक गैस्ट्रोएंटेरोपैन्क्रिएटिक न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर (जीईपी-एनईटी) के 91 मरीजों पर एक शोध किया। इस शोध में मरीजों को टारगेट अल्फा थेरेपी दी गई। 

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शोध में पाया गया कि जिंदगी और मौत से जूझ रहे कैंसर के गंभीर मरीजों पर 225 एसी-डीओटीएटीएटीई थेरेपी प्रभावी है। जीईपी-एनईटी सीधे कैंसर सेल पर वार करता है। शरीर के अन्य हिस्सों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, जिस कारण कैंसर के अन्य उपचार के मुकाबले यह ज्यादा सुरक्षित और बेहतर परिणाम देने वाली पाई गई है। 

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एम्स अब इस विधि का प्रयोग अन्य मरीजों पर भी कर रहा है। इस थेरेपी की सफलता से कैंसर के गंभीर मरीजों के लिए उम्मीद की किरण जगी है। यह थेरेपी कैंसर के अंतिम स्टेज में पहुंच चुके मरीजों को जिंदगी के कुछ और पल दे सकेगी। डॉक्टरों का दावा है कि अभी न्यूरोइंडोक्राइन कैंसर के मरीजों और प्रोस्टेट कैंसर में इसका इस्तेमाल ट्रायल के तौर पर हुआ है। आने वाले दिनों में इसका इस्तेमाल मल्टी ट्यूमर में किया जा सकेगा।

ऐसे हुआ शोध
अल्फा थेरेपी में दो प्रोटीन और दो न्यूटॉन का इस्तेमाल किया गया है। यह बीटा थेरेपी से 20 गुणा ज्यादा ताकतवर है। यह एक एडवांस वर्जन है। इसमें दवा ज्यादा दूर तक नहीं जा पाती। इसमें दवा को कैंसर के सेल तक लेकर जाया जाता है और रेडियोएक्टिव दवा कैंसर सेल को टारगेट करके मार देती है। 

91 मरीजों पर किया अध्ययन
न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डॉ. सीएस बाल ने बताया कि इस शोध में 91 मरीजों पर ट्रायल किया गया। इसमें 54 पुरुष और 37 महिलाएं हैं। इसमें दवा के रूप में मरीज को एक्टिनियम 225 दी जाती है। जिसे थोरियम से इसे बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि न्यूरोइंडोक्राइन कैंसर में मौत की संभावना बहुत ज्यादा है। एक्टर इरफान खान इसी से पीड़ित था।

अमेरिका ने माना एम्स का लोहा
डॉ. बाल ने कहा कि इस शोध के कारण अमेरिका ने भी एम्स का लोहा माना है। अमेरिका ने पहली बार किसी दूसरे देश के रिसर्च को इस तरह से स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि हमारे डॉक्टर जून में होने वाले सम्मेलन में इस शोध पर अपनी बात रखेंगे।

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