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क्यों होते हैं बच्चे ऑटिज्म का शिकार: AIIMS ने किया शोध, पिता के स्पर्म से लेकर हवा-पानी हैं बीमारी का कारण

Wed, 02 Apr 2025 05:44 AM IST
विकास कुमार राकेश शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राकेश शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विकास कुमार Updated Wed, 02 Apr 2025 05:44 AM IST
सार

- हवा-पानी पर बढ़ा भारी धातुओं का भार, बच्चे हो रहे ऑटिज्म के शिकार
- तेजी से बढ़ रही है ऑटिज्म की समस्या, बच्चों के व्यवहार में आता है बदलाव, सामान्य बच्चे से हो जाते हैं अलग

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AIIMS research found heavy metals to be a major factor in autism in children
बच्चों में तेजी से बढ़ रहा ओटिज्म - फोटो : Adobe stock

विस्तार

हवा पानी में बढ़ता भारी धातु का भार बच्चों के व्यवहार में बदलाव लाकर उन्हें ऑटिज्म का रोगी बना सकता है। इसका खुलासा एम्स के एक शोध से हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एसएसडी) एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है। बच्चों में यह रोग होने की आशंका रहती है। इससे रोगी बच्चों के व्यवहार, संचार और सामाजिक कौशल प्रभावित हो सकते हैं। 

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हवा-पानी के जरिए शरीर में करता है प्रवेश
ऑटिज्म के लक्षण हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं। मौजूदा समय में रोग के कारण का पता नहीं है। इसकी पहचान करने के लिए एम्स ने भारी धातु (हेवी मेटल) को लेकर शोध किया। इसमें पाया कि रोग होने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारी धातु की श्रेणी में पारा, कैडमियम, आर्सेनिक, क्रोमियम, थैलियम, सीसा सहित अन्य आते हैं। वायु प्रदूषण सहित दूसरे कारणों से यह हवा पानी के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर रहा है।

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जल्द प्रकाशित होगा शोध
एम्स में बाल न्यूरोलॉजी प्रभाग की प्रमुख प्रो. डॉ. शैफाली गुलाटी ने कहा कि शोध में बच्चों में ऑटिज्म रोग होने के पीछे हैवी मेटल एक बड़ा कारण पाया गया है। जल्द ही यह शोध प्रकाशित होगा।

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तैयार किया है स्क्रीनिंग टूल
रोग की पहचान के लिए एम्स में स्क्रीनिंग टूल तैयार किया है। इसमें एक माह से 18 माह तक बच्चे में ऑटिज्म होने का खतरा का पता चलता है।

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ऑटिज्म की पहचान बनी है पहेली
डॉ. गुलाटी ने कहा कि ऑटिज्म रोग की पहचान अभी भी एक पहेली बनी हुई है। इसकी पहचान के लिए अनुसंधान जारी है। इसमें देखा जा रहा कि कौन सा जीन पैनल आएगा जो इस रोग के लिए जिम्मेदार होगा। पिछले सात साल से एम्स का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बाल विकासात्मक विकार की अन्य संस्था के साथ मिलकर जेनेटिक टेस्ट कर रहे हैं, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं मिले। मौजूदा समय में इसके लिए डाउन सिंड्रोम, टीबी, न्यूरोफाइब्रोमैटॉसिस, जेनेटिक दोष कारण मान सकते हैं। इसके अलावा वायु प्रदूषण, कीटनाशक, पिता का ज्यादा उम्र, पिता का तनाव भी कारण हो सकता है। एम्स की प्रो. डॉ. रीमा दादा के साथ मिलकर एक अध्ययन किया। इसमें पाया कि पिता के स्पर्म की गुणवत्ता खराब होने से भी दिक्कत हो सकती है।

तेजी से बढ़ रहा है ऑटिज्म
देश में ऑटिज्म के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। यूएसए का डाटा बताता है कि मार्च 2024 में 36 बच्चों में एक बच्चे में यह रोग होने की आशंका होती है। देश में रोग की पकड़ के लिए साल 2011 में एक अध्ययन किया गया। इसमें कांगड़ा के पहाड़ी क्षेत्र, उड़ीसा से आदिवासी क्षेत्र, पलवल में ग्रामीण, हैदराबाद के शहरी और गोवा के तटीय क्षेत्र से सैंपल लिए गए। दो से 19 साल के बच्चों के सैंपल के अध्ययन में 89 में एक बच्चे में यह रोग होने की आशंका मिली। हालांकि समय के साथ यह रोग तेजी से बढ़ा है। एम्स में ऑटिज्म क्लीनिक में आने वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। यह रोग लड़की के मुकाबले लड़के में ज्यादा होता है।

अभिभावक बनाएं सकारात्मक रुख
डॉ. गुलाटी का कहना है कि ऑटिज्म के रोगी के साथ सकारात्मक व्यवहार करना चाहिए। अभिभावक इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

ऑटिज्म के लक्षण
- दूसरों से बातचीत-भावनाओं को समझने में परेशानी
- चमकदार रोशनी या तेज आवाज से परेशानी
- अपरिचित स्थितियों से चिंता
- एक ही चीज को बार-बार करना या सोचना
- आंखों से संपर्क कम होना
- अपने नाम पर प्रतिक्रिया न करना
- देखभाल करने वालों के प्रति उदासीनता
- ध्वनि, स्पर्श, और स्वाद के प्रति असामान्य प्रतिक्रिया
- घुलमिल कर रहने में दिक्कत होना

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