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Delhi NCR News: रीढ़ के दुर्लभ ट्यूमर की सर्जरी में मरीज के हिसाब से इलाज ज्यादा असरदार
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एम्स के 31 मरीजों पर अध्ययन में सामने आए सकारात्मक नतीजे, तीन महीने बाद दर्द में हुआ बड़ा सुधार
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। रीढ़ की हड्डी में होने वाले दुर्लभ ट्यूमर ऑस्टियोब्लास्टोमा और ऑस्टियोइड ऑस्टियोमा की सर्जरी के बाद मरीजों के दर्द में बड़ा सुधार हुआ। साथ ही उनकी न्यूरोलॉजिकल स्थिति में भी सुधार देखा गया। एम्स दिल्ली के हड्डी रोग विभाग ने 31 मरीजों पर यह अध्ययन किया है। अध्ययन के नतीजे अगस्त के अंत में यूरोपियन जर्नल ऑफ ऑर्थोपेडिक सर्जरी एंड ट्रॉमेटोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन में शामिल 20 मरीज ऑस्टियोब्लास्टोमा और 11 मरीज ऑस्टियोइड ऑस्टियोमा से पीड़ित थे। मरीजों की उम्र छह से 43 वर्ष के बीच थी। सभी मरीजों का कम से कम 24 महीने तक फॉलोअप किया गया। दोनों ट्यूमर में रीढ़ का दर्द सबसे आम शिकायत थी। नौ मरीजों में स्कोलियोसिस (रीढ़ सीधी होने के बजाय एक तरफ टेढ़ी होना) था, जबकि ऑस्टियोब्लास्टोमा वाले आठ मरीजों में इलाज से पहले न्यूरोलॉजिकल कमजोरी थी। अध्ययन का नेतृत्व डॉ. भावुक गर्ग ने किया। इसमें डॉ. श्रीजीत एम. बी. नायर, डॉ. निशांक मेहता और डॉ. तेजस्विन झा भी शामिल रहे।
ऑपरेशन के बाद हुआ सुधार
अध्ययन के अनुसार ज्यादातर ट्यूमर रीढ़ के पिछले हिस्से में पाए गए। 31 में से 26 मरीजों में ट्यूमर निकालने के साथ रीढ़ को स्थिर रखने के लिए इंस्ट्रूमेंटेशन किया गया। उपचार की योजना ट्यूमर की स्थिति, उसके फैलाव और सर्जरी के बाद रीढ़ की स्थिरता को ध्यान में रखकर बनाई गई। ऑपरेशन से पहले मरीजों का औसत दर्द स्कोर 6.3 था, जो सर्जरी के तीन महीने बाद घटकर 0.79 रह गया। न्यूरोलॉजिकल कमजोरी वाले ऑस्टियोब्लास्टोमा के सभी आठ मरीजों में छह महीने के फॉलोअप तक सुधार देखा गया।
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जटिलता की दर रही महज 16 प्रतिशत
अध्ययन में सर्जरी के दौरान या बाद में जटिलताओं की दर 16 प्रतिशत रही। एक मरीज में स्थानीय स्तर पर ट्यूमर दोबारा हुआ। बाद में उसका दोबारा ऑपरेशन किया गया। अंतिम फॉलोअप में वह बीमारी से मुक्त हो गया और सामान्य गतिविधियां करने लगा। शोधकर्ताओं के मुताबिक, रीढ़ के इन दुर्लभ ट्यूमर में सभी मरीजों के लिए एक जैसी सर्जरी करने के बजाय ट्यूमर की स्थिति और रीढ़ की संरचनात्मक स्थिरता के अनुसार उपचार तय करना अधिक प्रभावी हो सकता है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। रीढ़ की हड्डी में होने वाले दुर्लभ ट्यूमर ऑस्टियोब्लास्टोमा और ऑस्टियोइड ऑस्टियोमा की सर्जरी के बाद मरीजों के दर्द में बड़ा सुधार हुआ। साथ ही उनकी न्यूरोलॉजिकल स्थिति में भी सुधार देखा गया। एम्स दिल्ली के हड्डी रोग विभाग ने 31 मरीजों पर यह अध्ययन किया है। अध्ययन के नतीजे अगस्त के अंत में यूरोपियन जर्नल ऑफ ऑर्थोपेडिक सर्जरी एंड ट्रॉमेटोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन में शामिल 20 मरीज ऑस्टियोब्लास्टोमा और 11 मरीज ऑस्टियोइड ऑस्टियोमा से पीड़ित थे। मरीजों की उम्र छह से 43 वर्ष के बीच थी। सभी मरीजों का कम से कम 24 महीने तक फॉलोअप किया गया। दोनों ट्यूमर में रीढ़ का दर्द सबसे आम शिकायत थी। नौ मरीजों में स्कोलियोसिस (रीढ़ सीधी होने के बजाय एक तरफ टेढ़ी होना) था, जबकि ऑस्टियोब्लास्टोमा वाले आठ मरीजों में इलाज से पहले न्यूरोलॉजिकल कमजोरी थी। अध्ययन का नेतृत्व डॉ. भावुक गर्ग ने किया। इसमें डॉ. श्रीजीत एम. बी. नायर, डॉ. निशांक मेहता और डॉ. तेजस्विन झा भी शामिल रहे।
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ऑपरेशन के बाद हुआ सुधार
अध्ययन के अनुसार ज्यादातर ट्यूमर रीढ़ के पिछले हिस्से में पाए गए। 31 में से 26 मरीजों में ट्यूमर निकालने के साथ रीढ़ को स्थिर रखने के लिए इंस्ट्रूमेंटेशन किया गया। उपचार की योजना ट्यूमर की स्थिति, उसके फैलाव और सर्जरी के बाद रीढ़ की स्थिरता को ध्यान में रखकर बनाई गई। ऑपरेशन से पहले मरीजों का औसत दर्द स्कोर 6.3 था, जो सर्जरी के तीन महीने बाद घटकर 0.79 रह गया। न्यूरोलॉजिकल कमजोरी वाले ऑस्टियोब्लास्टोमा के सभी आठ मरीजों में छह महीने के फॉलोअप तक सुधार देखा गया।
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जटिलता की दर रही महज 16 प्रतिशत
अध्ययन में सर्जरी के दौरान या बाद में जटिलताओं की दर 16 प्रतिशत रही। एक मरीज में स्थानीय स्तर पर ट्यूमर दोबारा हुआ। बाद में उसका दोबारा ऑपरेशन किया गया। अंतिम फॉलोअप में वह बीमारी से मुक्त हो गया और सामान्य गतिविधियां करने लगा। शोधकर्ताओं के मुताबिक, रीढ़ के इन दुर्लभ ट्यूमर में सभी मरीजों के लिए एक जैसी सर्जरी करने के बजाय ट्यूमर की स्थिति और रीढ़ की संरचनात्मक स्थिरता के अनुसार उपचार तय करना अधिक प्रभावी हो सकता है।