सियासी हवा की बजाय अब वोटों के गुणा-भाग में जुटी भाजपा
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दिल्ली विधानसभा चुनाव के सर्वे के नतीजों में कांटे के मुकाबले की अटकलों ने भाजपा आलाकमान की नींद उड़ा दी है। अब दिल्ली की सियासत में अपनी हवा बनाने की बजाय भाजपा सियासी दलों को मिलने वाले वोटों के गुणा-भाग में जुट गई है।
आम आदमी पार्टी की ओर से मिल रही सियासी टक्कर के मद्देनजर भाजपा की उम्मीदें कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन पर ज्यादा टिक गई हैं।
मंगलवार को दिल्ली के चुनावी जंग में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सफल रैली देख भाजपा नेताओं के चेहरे पर चमक लौटी है। पार्टी ने अपने 13 केंद्रीय मंत्रियों को प्रचार में उतारने के साथ संघ से भी जमीन पर मैदान संभालने का आग्रह किया है।
किरण को चेहरा बनाने का दांव पड़ा उलटा
भाजपा रणनीतिकारों को लगता है कि दिल्ली का सियासी समीकरण दो दलों के बीच केंद्रित हो गया है। वोट का ध्रुवीकरण सीधे दो दलों के बीच रहेगा।
भाजपा जहां यह मान रही है कि मध्यम वर्ग का छिटका मतदाता केजरीवाल को छोड़ उसके साथ वापस आया है। लेकिन बीते चुनाव में कांग्रेस के साथ खड़ा अल्पसंख्यक और निचले तबके का मतदाता केजरीवाल से जुड़ा है।
वहीं किरण बेदी को चेहरा बनाने का भाजपा नेतृत्व का दांव भी अब तक उम्मीदों के मुताबिक चुनाव अभियान को रंग नहीं दे पाया है। इसीलिए पार्टी दुबारा से चुनावी जंग को मोदी के चेहरे से जोड़ने के प्रयास में है।
केजरीवाल को हल्के में नहीं ले रही भाजपा
अब तक आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल को हल्के में ले रही भाजपा ने अब उन्हें चुनौती मानना शुरू कर दिया है। एक केंद्रीय मंत्री ने माना कि दिल्ली में केजरीवाल की उपस्थिति है।
बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले 46 प्रतिशत वोट को विधानसभा चुनाव का आधार मानने से इनकार करते हुए उक्त मंत्री ने कहा कि दोनों चुनावों में अंतर रहता है।
लोकसभा चुनाव में दो राष्ट्रीय दलों के बीच सीधा मुकाबला था। लेकिन विधानसभा चुनाव में अन्य दल और कुछ निर्दलीय भी वोट लेते हैं।
पार्टी का अनुमान है कि महज 15 से 17 सीटों पर ही भाजपा-कांग्रेस और आप के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। बाकी 55 सीटों पर उसकी लड़ाई सीधे आप से है।
कांग्रेस बढ़ी तो भाजपा बढ़ेगी
अब भाजपा को दिल्ली में अपनी हवा बनने की उम्मीद से ज्यादा भरोसा कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन पर टिका है। वोट के गुणाभाग में जुटे भाजपा रणनीतिकारों को लगता है कि यदि कांग्रेस पार्टी अपने परंपरागत वोट और प्रभावशाली नेताओं के असर के सहारे अपना वोट प्रतिशत 12 से 14 के बीच खींच ले जाती है तो दिल्ली में भाजपा की सरकार बनेगी और यदि कांग्रेस का वोट प्रतिशत दहाई से निचे 7-8 प्रतिशत तक ही सिमट कर रह गया तो केजरीवाल की लाटरी निकल सकती है।