कॉल सेंटरों से करते थे देशभर में ठगी, गिरोह का भंडाफोड़
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स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने दिल्ली में कॉल सेंटरों से देशभर में बीमा पॉलिसी के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया है। मामले में एक जालसाज को गिरफ्तार किया है। गिरोह के आठ अन्य लोग फरार हैं।
गिरोह ने देहरादून के सहसपुर के एक बुजुर्ग से ऋण दिलाने के नाम पर 15 लाख रुपये ठगे थे। आरोपियों के 10 खाते पकड़ में आए हैं, जिसमें कई करोड़ का लेन-देन किया गया है।
एसटीएफ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सदानंद दाते ने बताया कि सहसपुर निवासी बुजुर्ग देवांग गांधी ने चार दिन पहले रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि बीमा पॉलिसी पर ऋण देने के नाम पर उनसे 15 लाख रुपये ठग लिए। मामले की विवेचना साइबर थाने के सुपुर्द की गई थी।
जांच में पता चला कि जिन 10 बैंक खातों में रकम जमा कराई गई, वे फर्जी पते पर खोले गए हैं। एक खाते में एक माह में करीब एक करोड़ 63 लाख और दूसरे में 96 लाख रुपये आए। दो खातों में 15 लाख रुपये जब्त कर लिए गए।
बाकियों की तलाश में दिल्ली में डेरा डाले है पुलिस
इसी आधार पर जांच को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली के तिलकनगर थाना क्षेत्र के महावीर नगर में रहने वाले आशीष दुबे (मूल निवासी यूपी के अमेठी) को गिरफ्तार किया गया।
पूछताछ में आरोपी ने बताया कि दिल्ली के जनकपुरी, प्रीतमपुरा, धर्मपुरा, रमेश नगर और नोएडा में ठगी के कॉल सेंटर खुले हैं, जहां से बीमा पॉलिसी पर लोन के नाम पर ठगी की जाती है। नेटवर्क में आशीष समेत 9 लोग बताए गए हैं। इनकी तलाश में एसटीएफ और साइबर थाने की टीम दिल्ली और नोएडा में डेरा डाले है।
इन कॉल सेंटरों में ताले लग गए हैं। एसएसपी दाते ने बताया कि दो खातों से जब्त 15 लाख रुपये से बुजुर्ग देवांग गांधी की वसूली गई रकम मिल गई है। आरोपी को रिमांड पर लेने का प्रयास किया जा रहा है।
टीम को पुरस्कार की घोषणा
बताया गया कि साइबर थाने का यह पहला बड़ा खुलासा है। एसएसपी दाते ने एसटीएफ के दारोगा वेदप्रकाश थपलियाल, विनोद चौरसिया, हैड कांस्टेबल धीरेंद्र नेगी, कांस्टेबल हरेंद्र भंडारी, रवि बोरा, संजय कुमार और तेजपाल को ढाई हजार रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा की है।
पांच से 10 प्रतिशत तक मिलता है कमीशन
उत्तर प्रदेश के अमेठी का रहने वाला आशीष इस धंधे में छह माह पहले जुड़ा था। वह अब तक ठगी में करीब पांच लाख रुपये कमा चुका है। एसएसपी ने आशीष के हवाले से बताया कि इस धंधे में पांच से लेकर 10 प्रतिशत का कमीशन मिलता है। रकम खाते में आते ही उनका कमीशन मिल जाता है। यह धंधा बड़े पैमाने पर है। वक्त के हिसाब से ठगी का ट्रेंड बदल जाता है।
कौन बेचता है उपभोक्ता का डाटा
इस तरह की ठगी में हासिल किया गया उपभोक्ता का डाटा सबसे कारगर होता है। विभिन्न बीमा कंपनियों में की गई बीमा पॉलिसी के नंबर के साथ पता और फोन तक गिरोह के पास रहता है। पॉलिसी का नंबर मिलने के बाद शक होने की उम्मीदें कम रहती हैं। इसी वजह से उपभोक्ता उनका शिकार हो जाते हैं।
एसएसपी दाते ने बताया कि आशीष दुबे यह तो नहीं बता पाया कि डाटा कहां से मिलता है, लेकिन पता चला है कि ब्रोकर स्तर पर उसे खरीदा जाता है। जाहिर है कि ठगों के तार कंपनियों के अंदर तक हैं, जहां से वे आसानी से डाटा हासिल कर लेते हैं।